आनंद कुमार

गणित को बनाया सामाजिक परिवर्तन का हथ‍ियार

आनंद कुमार गणित के विश्‍व-विख्‍यात शिक्षक हैं। मगर महज एक शिक्षक होने के अलावा वो एक ऐसी मौन सामाजिक परिवर्तन के नायक भी हैं जिसे उन्‍होंने अपने क्रांतिकारी शैक्षिक पहल ‘सुपर 30’  के जरिये अंजाम दिया है। एक जनवरी 1973 को पटना में जन्‍मे आनंद कुमार बचपन से ही गणित को लेकर दीवाने थे। उनका जीवन बड़ी ही कठिनाइयों से गुजरा। घर के खर्चे चलाने के लिए उनकी मां पापड़ बनाती थीं जिसे शाम के समय बेचने और ग्राहकों तक पहुंचाने का काम आनंद के जिम्‍मे थे। जब वो स्‍नातक की पढ़ाई कर रहे थे तभी उन्‍होंने एक गणित क्‍लब ‘रामानुजम स्‍कूल ऑफ मैथेमैटिक्‍स’ की स्‍थापना की थी। उसी दौरान गणित की उनकी समस्‍याएं और आलेख जानी-मानी पत्रिकाओं और जर्नल्‍स में प्रकाशित होने लगे थे।  ऋतिक रोशन अभिनीत और विकास बहल द्वारा निर्देशित आनंद की बायोपिक ‘सुपर 30’  इसी महीने की 12 तरीख को रीलिज हो चुकी है। उनकी उपलब्धियों को ध्‍यान में रखते हुए साल 2018 में आउटलुक पत्रिका ने उन्‍हें आइकन्‍स ऑफ बिहार के सम्‍मान से नवाजा है

वर्ष 1994 में आनंद कुमार को उच्‍च शिक्षा के लिए ब्रिटेन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में दाखिला मिल रहा था मगर उनके परिवार की खराब आर्थिक दशा ने उनकी राह रोक दी। डाक विभाग में बेहद कम वेतन पर काम कर रहे उनके पिता की अचानक मौत हो गई और परिवार की कमाई का मुख्‍य जरिया बंद हो गया। घर के खर्चे चलाने के लिए उनकी मां पापड़ बनाती थीं जिसे शाम के समय बेचने और ग्राहकों तक पहुंचाने का काम आनंद के जिम्‍मे थे। हालांकि दिन के समय गणित के सिद्धांत और आलेख लिखने का काम बदस्‍तूर जारी रहा।
बचपन से ही भारी गरीबी देखने के कारण उन्‍हें इसके कष्‍ट का ऐसा अहसास था उन्‍होंने समाज के उस तबके के बच्‍चों के लिए कुछ करने की ठानी जो अवसर न मिल पाने के कारण पिछड़ जाते हैं। यही सोच उनकी प्रेरणा बनी जिसने ‘सुपर 30’ को जन्‍म दिया। ये ऐसा प्रोग्राम है जो समाज के सबसे गरीब तबके से प्रतिभाशाली 30 बच्‍चों को चुनकर उन्‍हें जेईई, इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी की प्रवेश परीक्षा तथा अन्‍य प्रतिष्ठित व‍िज्ञान/इंजीनियरिंग संस्‍थानों में प्रवेश दिलाने के लिए प्रशिक्षण देने का दावा करता है।
सुपर 30 के पिछले 17 सालों के इत‍िहास में 480 बच्‍चों में से 422 बच्‍चे अबतक आईआईटी जेईई की परीक्षा के जरिये देश के शीर्ष प्रौद्योगिकी संस्‍थानों में प्रवेश पा चुके हैं। खास बात ये है कि इनमें से ज्‍यादातर बच्‍चे समाज के सबसे कमजोर तबके से आते हैं और उनमें भी अधिकांश ऐसे हैं जो अपने परिवार में पढ़ाई करने वाली पहली पीढ़ी हैं और जिन्‍होंने बहुत ही सामान्‍य स्‍कूलों में शिक्षा पाई थी। सुपर 30 में इन बच्‍चों को मुफ्त रहना, खाना और इन सबसे बढ़कर, मुफ्त की कोचिंग मिलती है। हालांकि आनंद कुमार को अपनी इस पहल में निजी क्षेत्र और सरकारों से वित्‍तीय मदद के कई प्रस्‍ताव मिले मगर आनंद कुमार इन बच्‍चों के सभी खर्च खुद उठाते हैं। वो प्राइवेट ट्यूशन से प्राप्‍त अपनी कमाई का एक हिस्‍सा इस काम में लगाते हैं जिसमें उनका पूरा परिवार उनका साथ देता है।

दुनिया के कई चैनलों, बड़े अखबारों और पत्रिकाओं ने सुपर 30 के भाव को पकड़ने का प्रयास कर आनंद कुमार के इस काम को वैश्विक पहचान दी है। डिस्‍कवरी चैनल ने सुपर 30 पर एक घंटे का कार्यक्रम बनाकर इसे ‘सामाजिक बदलाव के क्षेत्र में क्रांतिकारी प्रयोग’ करार दिया तो वहीं जापान के एसटीबी रिसर्च इंस्‍टीट्यूट के मुख्‍य अर्थशास्‍त्री योइची इतोह ने सुपर 30 को ‘भारत का गोपनीय हथियार’ बताया। एसटीबी रिसर्च इंस्‍टीट्यूट ने भी प्रसि‍द्ध एनएचके चैनल के लिए सुपर 30 पर एक फ‍िल्‍म बनाई है।  पूर्व मिस जापान नोरिका फूजीवारा आनंद कुमार की इस पहल पर एक डॉक्‍यूमेंट्री बनाने पटना पहुंचीं। फ्रेंच 24 ने भी उनकी जिंदगी पर एक छोटी से डॉक्‍युमेंट्री फ‍िल्‍म बनाई है। सुपर 30 पर बनी कई फि‍ल्‍मों ने अंतरराष्‍ट्रीय पुरस्‍कार जीते हैं।

आनंद कुमार को उनके इस आंदोलन के कारण देश की कई संस्‍थाओं ने सम्‍मानित किया है। जबरदस्‍त शिक्षण तकनीक के कारण आनंद कुमार का नाम लिम्‍का बुक ऑफ रिकार्ड्स में भी ाी भी शामिल हो चुका है। टाईम पत्रिका ने साल 2010 में सुपर 30 को एशिया के बेहरतीन संस्‍थान की सूची में रखा था। पूर्व अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा के विशेष दूत रशद हुसैन ने भी इसकी तारीफ करते हुए इसे देश का सबसे अच्‍छा इंस्‍टीट्यूट करार दिया था। न्‍यूजवीक ने आनंद कुमार की पहल का संज्ञान लेते हुए इसे दुनिया के चार सबसे अनूठे स्‍कूलों की सूची में जगह दी है।

चाइना टीवी ने अपने बेहद लोकप्रिय शो में शामिल होने के लिए आनंद कुमार को बीजिंग आमंत्रित किया था। चाइना इंटरनेशनल रेडियो, बीबीसी और जर्मन रेडियो आदि ने भी सुपर 30 पर कार्यक्रम प्रसारित किए हैं। आनंद कुमार को कनाडा के ब्रिटीश कोलंबिया की सरकार ने भी सम्‍मानित किया है।

अपने काम के लिए आनंद कुमार को विभिन्‍न सम्‍मानों, पुरस्‍कारों, मानद उपाधियों से वैश्विक मान्‍यता मिली है। नवंबर 2010 में उन्‍हें बिहार सरकार के सर्वश्रेष्‍ठ पुरस्‍कार मौलाना अब्‍दुल कलाम आजाद शिक्षा पुरस्‍कार दिया गया। 2010 में ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने बेंगलुरु में उन्‍हें प्रोफेसर यशवंतराव केलकर युवा पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया। अप्रैल 2011 में यूरोप की पत्रिका फोकस ने उन्‍हें ऐसे व्‍यक्ति के रूप में चुना जिनमें अतिप्रतिभाशाली लोगों की प्रतिभा निखारने की क्षमता है। ब्रिटेन की पत्रिका मोनोकल ने उन्‍हें दुनिया के 20 पथप्रदर्शक शिक्षकों में शामिल किया है। आनंद कुमार की आत्‍मकथा कनाडा निवासी मनोविज्ञानी बिजू मैथ्‍यू ने लिखी है और इसकी प्रति कुमार ने खुद तात्‍कालीन राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भेंट की थी।

गरीबों को विशेष शिक्षा देने के लिए हाल में ही आनंद कुमार को बैंक ऑफ बड़ौदा अवार्ड मिला है। राजकोट में आयोज‍ित आठवें राष्‍ट्रीय गणित कन्‍वेंशन में उन्‍हें रामानुजन मैथमैटिक्‍स अवार्ड दिया गया। कोयंबटूर के करपगम यूनिवर्सिटी ने आनंद कुमार को डॉक्‍टरेट ऑफ साइंस की मानद उपाधि दी है। राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों राष्‍ट्रीय बाल कल्‍याण पुरस्‍कार से सम्‍मानित आनंद कुमार को शिक्षा के क्षेत्र में शानदार काम करने के लिए मध्‍य प्रदेश सरकार ने महर्षि वेद व्‍यास राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार प्रदान किया। जर्मनी में सेक्‍सोनी के शिक्षा मंत्रालय ने भी उनका सम्‍मान किया है। अमिताभ बच्‍चन को आरक्षण फि‍ल्‍म में उनकी भूमिका निभाने में भी आनंद कुमार से मदद मिली थी।

निर्देशक विकास बहल ने सुपर 30 के नाम से आनंद कुमार और उनकी शिक्षण पद्धति पर बायोपिक फ‍िल्‍म बनाई है जिसमें आनंद कुमार की भूमिका जाने माने अभिनेता ऋतिक रोशन ने निभाई है। फ‍िल्‍म में अभिनेत्री मृणाल ठाकुर की भी अहम भूमिका है। साल 2014 में अमेरिका के प्रतिष्ठित मैसाच्‍यूसेट्स इंस्‍टीट्यूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी (एमआईटी) और हार्वर्ड यूनिविर्सिटी ने आनंद कुमार को अपने यहां लेक्‍चर के लिए बुलाया तब आनंद कुमार ने कहा था, ‘मैं इस बारे में बात करूंगा कि मनोवैज्ञानिक और सामाजिक बदलाव की दिशा में ‘सबको शिक्षा’ को एक शक्तिशाली हथियार के रूप में इस्‍तेमाल कर कैसे ये दुनिया एक बेहतर जगह बन सकती है। पिछले 14 वर्षों में अपने गृह राज्‍य बिहार में मैंने जो किया वो समाज के वंचित तबके के प्रतिभाशाली और जोशीले बच्‍चों को सही अवसर देने की बहुत छोटी सी पहल थी मगर उसके परिणाम आश्‍चर्यजनक थे।’