Home एग्रीकल्चर पालिसी किसानों के लिए बने रिस्क मैनेजमेंट अथॉरिटी- अशोक दलवई
किसानों के लिए बने रिस्क मैनेजमेंट अथॉरिटी- अशोक दलवई
किसानों के लिए बने रिस्क मैनेजमेंट अथॉरिटी- अशोक दलवई

किसानों के लिए बने रिस्क मैनेजमेंट अथॉरिटी- अशोक दलवई

 औद्योगिक और वित्तीय क्षेत्र की तरह भारत के कृषि क्षेत्र में भी सुधारों की जरूरत है। इसमें विदेशी कंपनियों और घरेलू कॉरपोरेट सेक्टर को निवेश की अनुमति दी जानी चाहिए। 1991 में शुरू हुए आर्थिक सुधारों की बदौलत भारत 2.7 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बना है, लेकिन कृषि क्षेत्र अभी तक इन सुधारों से वंचित है। हमें यह नहीं समझना चाहिए कि कृषि क्षेत्र सुधारों के दबाव को नहीं झेल सकेगा। सुधारों के कारण ही हमें आज स्कूटर खरीदने के लिए दो साल का इंतजार नहीं करना पड़ता।  इसी दिशा में हमें रिस्क मैनेजमेंट अथॉरिटी बनाने की भी जरूरत है। किसानों की आय दोगुनी करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई समिति के अध्यक्ष डॉ अशोक दलवई ने शुक्रवार को सेंटर फॉर एग्रीकल्चर पॉलिसी डायलॉग के एक कार्यक्रम में यह बात कही।

दलवई ने कहा कि सरकार का फोकस न केवल उत्पादकता बढ़ाने पर है बल्कि किसानों की कृषि क्षेत्र के लिए लागत कम करने के लिए भी अहम कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह भी जरूरी है कि किसानों की परिभाषा को व्यापक किया जाय। इसी दिशा में पशुपालक और मछली पालकों को भी किसान क्रेडिट कार्ड देने की पहल की गई है। साथ ही इस लक्ष्य को पाने के लिए सरकार ने बजट में 16 बड़े बिंदुओं पर फोकस किया है, जिनको लागू करने पर जोर दिया जा रहा है।

खेती में तकनीकी के इस्तेमाल पर दलवई ने कहा कि उसको बढ़ावा देने के भी कदम उठाए जा रहे हैं। किसानों की आय बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के साथ ही प्रधानमंत्री किसान मान धन योजना, ई-नाम और स्वयं सहायता समूह तथा एफपीओ के गठन पर जोर दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने पीएम आशा योजना के तहत गेहूं और चावल के अलावा दलहन और तिलहन की खरीद भी किसानों से शुरू की है। इस पहल  का ही असर है कि दलहल का उत्पादन रिकार्ड 25 मिलियन टन तक पहुंच गया है। यहीं नहीं न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकार की खरीद भी छह साल पहले के 6 फीसदी से बढ़कर अब 25 फीसदी के करीब पहुंच गया है। इन कदमों से निश्चित तौर पर लक्ष्य को हासिल करना आसान होगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सरकार सभी खाद्यान्न एमएसपी पर नहीं खरीद सकती है।

नीतियों और उन पर अमल में कितना फर्क होता है, इस पर भाजपा किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष नरेश सिरोही ने कहा कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार नीतियां तो अच्छी बनाती है, लेकिन उन नीतियों को लागू करने में कई अड़चने आड़े आ जाती हैं। आज देश में खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ाना समस्या नहीं है, क्वालिटी उत्पादन की समस्या है। किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार जो नीतियां बनाती है, उनका अंतिम परिणाम हमें क्या मिला, यह बात बहुत मायने रखती है। कोशिश होनी चाहिए कि जो भी नीतियां बनें, उन पर अमल भी हो।

किसान सरकार के इस लक्ष्य पर क्या सोचते हैं, इस पर उनका प्रतिनिधित्व करने वाले राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय संयोजक सरदार वीएम सिंह ने कहा कि सरकार किसानों को केवल वोट बैंक समझती है। मैं जानना चाहता हूं कि पिछले छह साल में किसानों की इनकम कितनी बढ़ी, कि हम दो साल में दोगुने का लक्ष्य हासिल कर लेंगे। ओलावृष्टि से फसल बर्बाद हो जाती है, आवारा पशु किसानों की फसल बर्बाद कर रहे हैं, उन्हें मुआवजा नहीं मिलता है। गन्ने का भुगतान किसानों को समय पर नहीं हो रहा है। उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार ने पिछले तीन साल से गन्ने का दाम नहीं बढ़ाया है जबकि इस दौरान, बिजली के दाम तीन बार बढ़ चुके हैं। किसान को भीख नहीं चाहिए, अपना हक चाहिए। उन्होंने कहा कि देश का किसान लगातार कर्ज के चंगुल में फंसता जा रहा है। किसानों को बचाना है तो उसका पूरा कर्ज माफ करके एमएसपी पर फसल खरीद गारंटी अधिकार देना होगा।

कृषि नीतियों पर आउटलुक हिंदी के संपादक हरवीर सिंह का कहना था कि इस समय जरूरत है कि कोऑपरेटिव को राजनीतिकरण से मुक्त किया जाए, जिससे किसानों के हित पूरे हो सकें। कोऑपरेटिव में सुधार से किसानों के लिए अपनी आय बढ़ाना आसान हो जाएगा। इस मौक पर इंडियन एक्सप्रेस के वरिष्ठ पत्रकार हरीश दामोदरन का कहना था इस समय भारतीय किसानों के लिए बांग्लादेश, श्रीलंका, इंडोनेशिया जैसे नए बाजार खड़े हो रहे हैं। ऐसे में हमें निर्यात पर जोर देना चाहिए। इसके लिए कृषि उत्पादों के निर्यात की लिए नीतियां सख्त बनानी होगी, साथ ही किसानों के लिए डीबीटी मॉडल लागू हो। उन्होंने कहा कि जो भी नीतियां बनाई जाएं, उसमें किसान को पैसा मिलना सुनिश्चित होना चाहिए। साथ ही नीति निर्माताओं को केवल कंज्यूमर आधारित सोच से आगे बढ़ना चाहिए।

स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संयोजक अश्विनी महाजन ने कहा, मैं अपने अनुभवों से साफ तौर पर कह सकता हूं कि हमें कृषि क्षेत्र में इंटीग्रेटेड सिस्टम पर जोर देना होगा। नीतियां लागू करने में अहम भूमिका निभाने वाले बाबुओं की नीयत भी कुछ हद तक सही नहीं है। इस वजह से इस लक्ष्य को पूरा करने में दिक्कत आ रही है। कृषि मूल्य एवं लागत आयोग के पूर्व चेयरमैन और सेंटर फॉर एग्रीकल्चर पॉलिसी डायलॉग के सदस्य डॉ. टी.हक ने कहा कि किसानों की इनकम दोगुनी करने के लिए प्राइस रियलाइजेशन में 17 फीसदी की बढ़ोतरी होनी चाहिए। किसानों को कोऑपरेटिव, एफपीओ या दूसरे तरीकों से संगठति होना चाहिए। हक के अनुसार पीम किसान योजना अच्छी पहल है। लेकिन 2003 से मार्केट रिफॉर्म की बात हो रही है, उसे पूरा करने की भी जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज की चर्चा से जो भी सुझाव निकल कर आ रहे हैं। उन्हें जल्द ही ड्रॉफ्ट कर जल्द सरकार को सौपा जाएगा, जिससे सरकार लक्ष्य को पाने की दिशा में आ रही अड़चनों को दूर कर सके।