Home एग्रीकल्चर न्यूज मृदा प्रदूषण चिंता का विषय, नैनोकण का खतरा
मृदा प्रदूषण चिंता का विषय, नैनोकण का खतरा
मृदा प्रदूषण चिंता का विषय, नैनोकण का खतरा

मृदा प्रदूषण चिंता का विषय, नैनोकण का खतरा

कृषि योग्य मिट्टी में भारी-धातु (heavy-metals) का बढ़ता संचय विशेष रूप से खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिक तंत्र पर हानिकारक प्रभावों के कारण, हाल के वर्षो में सभी का ध्यान आकर्षित किया है। सामान्यतः मिटटी में सीसा (Pb), क्रोमियम (Cr), आर्सेनिक (As), जस्ता (Zn), कैडमियम (Cd), तांबा (Cu), पारा (Hg), और निकल (Ni) जैसी धातु ज़्यदा पायी जाती है। मृदा आज इन भरी धातुओं का सिंक (sink) बनती चली जा रही है चाहे वो कल-कारखाने से निकलने वाली व अन्य मानवजनित गतिविधियों या प्राकृतिक रूप से रिसने वाली धातुए, सब जाकर मिट्टी में ही इकट्ठा हो रही है। इसके अलावा गहन-कृषि (Intensive agriculture) क्रियाये, अत्यधिक रासायनिक खादों, कीटनाशक, खरपतवारनाशक, ग्रोथ प्रोमोटर्स इत्यादि का प्रयोग कृषि योग्य भूमि को प्रदूषित कर रहा है। दूसरी ओर, बरसात या नम क्षेत्रों में एसिड-आधारित उर्वरकों का उपयोग अप्रत्यक्ष रूप से मिट्टी का पीएच (pH) कम कर देता है जो मृदा में मौजूद भारी धातुओं की मोबिलिटी बढ़ा देता और वो परेन्टल रॉक से ऊपर कृषि योग्य मृदा में आ जाते है। मृदा में बढ़ता प्रदुषण कई अन्य समस्याओं को भी जन्म दे रहा है जैसे की पीने योग्य पानी को प्रदूषित करना, प्रदूषक का खाद्य फसलों में इकट्ठा होना, कृषि योग्य जीवाणुओं को प्रभावित करना इत्यादि इत्यादि।

नई तरह के प्रदूषण (नैनोकण) का खतरा


(पर्यावरण में बढ़ते नैनो कण व भारी धातुएं तथा मानव स्वाथय पर प्रभाव)

दरअसल, यह खतरा नैनोकण के असीमित प्रयोग के कारण होगा। नैनो-युग की शुरुआत नब्बे के दशक के अंत में हुई और देखते ही देखते यह व्यवसाय अरबों डॉलर तक पहुंच गया। एक अनुमान के अनुसार सिर्फ पर्यावरण के क्षेत्र में ही नैनोकण का प्रयोग 2020 तक 42 अरब डॉलर तक पहुंच जायेगा। हर वो कण जिसका आकर 100 नैनोमीटर या इससे छोटा हो नैनोकण माना जायेगा। आकर छोटा होने पर इन कणो की रसायनिक और भौतिक लक्षण बदल जाता है। जैसे कि जिंक के नैनोकण बनाने पर ये पारदर्शी हो जाता है इत्यादि इत्यादि। इन्ही विशिष्ट विशेषताओं के कारण नैनोकणों का प्रयोग अत्यधिक बढ़ा है और बढ़ रहा है खासकर कृषि में, नैनो-उर्वरक, नैनो-कीटनाशक, नैनो-रोगनाशक रूप में, जो अत्यधिक भयाबर हो सकता है। इसके अलावा विभिन्न स्रोतों द्वारा प्रत्येक वर्ष हजारों टन नैनोकण पर्यावरण में छोड़े जाते है। जिनमें से अधिकांश मृदा में जा कर एकत्र होते हैं।

गांव से निकलकर फेडरल यूनिवर्सिटी रूस के टॉप टेन वैज्ञानिको में जगह बनायी

हरदोई के मल्लावां कटरी तेरवा कुल्ली के एक छोटे से गांव गुलाब पुरवा में जन्मे डॉ विष्णु राजपूत ने चंद्रशेखर आजाद कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर व चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंस बेइजिंग, चीन  से कृषि की पढ़ाई करने के बाद 2015 में रूस के दक्षिणी संघीय विश्वविद्यालय में शोध कार्य शुरू किया और मृदा सुधार के क्षेत्र में अतुलनीय परिणाम प्राप्त किए हैं। शोध की मुख्य दिशा पर्यावरण प्रदूषण, खासकर मृदा प्रदूषण (भारी धातियो, नैनो पार्टिकल, पोली एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन आदि) के खिलाफ लड़ाई में प्रभावी तरीकों तकनिकी का विकास करना है और पादप उतको में उसके संचय का सही आंकलन करना इत्यादि, जिसका सीधा संबंध खाद्य पदार्थो अर्थात् कृषि उत्पादों की सुरक्षा से है। डॉ राजपूत ने ये भी बताया की आजकल इन भारी धातुओं के नैनोकण जो भी अत्यधिक प्रयोग हो रहे है, बड़ी समस्याए बनते चले जा रहे है। हलाकि इन कणो के उपयोग से मानव जीवन बहुत आसान हुआ है, चाहे वो कृषि के क्षेत्र में हो या फिर चिकित्सा में। इसलिए वह इनके सुरछित उपयोग की विधि पर कार्य कर रहे है।

उनके द्वारा किया जा रहा वर्तमान अनुसंधान खाद्य व अनाज वाली फसलों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं। उन्हने बताय की बढ़ता औद्योगीकरण तथा मानवजनित गतिविधियों के करना अत्यधिक मात्रा में विषाक्त धातुएं कृषि योग्य मिट्टी में आ रही है जिनको अलग करने की सुचारु विधि न होने की बजह से मृदा स्वाथ्य ख़राब हो रहा है और खाद्यान प्रदूषित हो रहा है। उन्होंने मिट्टी से भारी धातुओं को हटाने के लिए प्रौद्योगिकी का विकास किया और धातु प्रतिरोधी बैक्टीरिया की विविधता का भी अध्ययन किया और ऐसे प्रदूषित वातावरण में पौधों को उगाने के लिए विधि भी विकसित की। इन तकनिको द्वारा प्रदूषित मृदा में स्वाथ्य खाद्यान का उत्पादन किया जा सकता है। साथ ही यह मिटटी में सूक्ष्म जीवो की संख्या को बढ़ाकर उपजाऊ बनाये गा।

मिला "हाईली क्वालिफाइड स्पेशलिस्ट का स्टेटस! 

डॉ राजपूत ने 110 उच्च गुणवत्ता के शोध लेख प्रकाशित किये, जिनमे से 49 अंतरराष्ट्रीय डेटाबेस स्कोपस और वेब ऑफ साइंस में अनुक्रमित हैं और इसी डाटा बेस की 2020की रिपोर्ट के अनुसार विश्वविद्यालय में कार्यरत पांच हज़ार वैज्ञानिको अथवा शोध कार्यकर्तओं में से टॉप 10 सबसे सफल शोध में सक्रिय वैज्ञानिकों में से एक बन गए। साल 2019 के लिए डॉ. राजपूत को “एकेडमी ऑफ बायोलॉजी एंड बायोटेक्नोलॉजी“, साउथर्न फ़ेडरल यूनिवर्सिटी, रूस द्वारा शिक्षण व शोध में प्रसंसनीय कार्य के लिए प्रशस्तिपत्र दिया गया था और हालही में में यूनिवर्सिटी व रूस सरकार की तरफ से "हाइली क्वालिफाइड स्पेशलिस्ट" का स्टेटस दिया गया। वर्तमान में विष्णु राजपूत अग्रणीय शोध कर्ता अर्थात एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।

पूरी दुनिया के लिए हो सकते है लाभकारी

उनके द्वारा किए गए शोध के परिणाम न केवल रूस में, बल्कि पूरी दुनिया भर में भूमि संसाधनों की पारिस्थितिक स्थिति में सुधार के लिए महत्वपूर्ण हैं। दरअसल, उन पर उगाई जाने वाली फसलों की गुणवत्ता भी मिट्टी की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। जिसमें से भोजन का उत्पादन किया जाता है, जो सीधे तौर पर लोगों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा है।

हाल ही ही में यह न्यूज़ रुसी भाषा के कई पत्र पत्रिकाओं के साथ फेडरल यूनिवर्सिटी के ऑफिसियल न्यूज पोर्टल में प्रकाशित हुए है।

(https://sfedu.ru/www2/web/press-center/news/63443)(https://www.1tv.ru/news/2020-09-17/393415dlya_molodyh_uchenyh_kotorye_vernutsya_obratno_iz_za_granitsy_i_reshat_rabotat_v_rossii_sozdadut_vse_usloviya)। ज्यादा जानकारी के लिए उनकी शोध वेबसाइट विजिट करे -https://www.researchgate.net/profile/Vishnu_Rajput2