Home एग्रीकल्चर न्यूज भारतीय कृषि वैज्ञानिक को उच्च शोध के लिए रूस में मिला सम्मान, नैनो तकनीकी पर कर रहे हैं काम
भारतीय कृषि वैज्ञानिक को उच्च शोध के लिए रूस में मिला सम्मान, नैनो तकनीकी पर कर रहे हैं काम
भारतीय कृषि वैज्ञानिक को उच्च शोध के लिए रूस में मिला सम्मान, नैनो तकनीकी पर कर रहे हैं काम

भारतीय कृषि वैज्ञानिक को उच्च शोध के लिए रूस में मिला सम्मान, नैनो तकनीकी पर कर रहे हैं काम

यूपी के जिला हरदोई के छोटे से गांव से निकल कर दक्षिणी रूस के सबसे बड़े विश्वविद्यालय "साउथर्न फ़ेडरल यूनिवर्सिटी, रोस्तोव-आन -डॉन में अपने आधुनिक महत्वपूर्ण शोधो से डॉ विष्णु राजपूत देश का नाम रोशन कर रहे है ।

हरदोई के कटरी तिर्वा के गुलाब पुरवा में जन्मे डॉ0  विष्णु राजपूत पिछले पांच वर्षो से पर्यावरण प्रदुषण पर कार्य कर रहे है और अपने अथक प्रयास व आधुनिक शोधो से विश्वविद्यालय में कार्यरत पांच हज़ार वैज्ञानिको में "टॉप टेन" में जगह बनाने के साथ, साल के अंत में उन्हें "अपने उच्च शोधो व हाई इम्पैक्ट प्रकाशन के लिए विश्वविद्यालय की तरफ से "सर्टिफिकेट आफ ऑनर" भी मिला है।

यह सम्मान उन्हें विश्वविद्यालय के प्रोफसर "एनातोली मेतेलीत्सा" वाईस रेक्टर (उप कुलपति) आफ साइंस एंड रिसर्च,  द्वारा दिया गया। विश्वविद्यालय ने पहली बार किसी रुसी अथवा विदेशी वैज्ञानिक को यह "ऑनर" प्रदान किया है। जून 2020 में ही डॉ राजपूत को एजुकेशन मिनिस्ट्री, रूस तथा विश्वविद्यालय द्वारा "हाइली क्वालिफाइड स्पेशलिस्ट इन एग्रीकल्चर साइंस" का स्टेटस भी दिया गया था।

डॉ0 राजपूत नैनो कणों के विभिन्न क्षेत्र में बढ़ते उपयोग से मानव स्वास्थ्य व पौधों पर होने वाले प्रभाव को बारीकी से जानने की और उसका सही उपयोग के लिए शोध कर रहे है। हर वो कण जिसका आकर 100 नैनोमीटर या इससे छोटा हो “नैनोकण” माना जाता है। इतने छोटे आकार पर इन पदार्थो की क्रियाशीलता बदल  जाती है।  इन्ही विशिष्ट विशेषता के कारण आज ये कण हर क्षेत्र में खास कर कृषि में नैनो फर्टीलिज़ेर्स, नैनो पेस्टीसिड्स के रूप के उपयोग के लिए तैयार है जिनकी थोड़ी मात्रा ही कृषि उत्पादन के लिए काफी लाभकारी कारगर हो सकती है।

ऐसे में डॉ राजपूत के शोधो की महत्वता अत्यधिक बढ़ जाती है, ताकि इन कणो वाले पदार्थो को सुरक्षित उपयोग में लाया जा सके। डॉ राजपूत ने 131 अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अत्यधिक उपयोगी शोध, तथा पांच साइंटिफिक बुक्स प्रकाशित की है।

हाल ही में पर्यावरणीय कारक का कोरोना के ट्रांसमिशन अथवा फैलाव, संक्रामकता में बढ़ोत्तरी, और पर्यवरण में लम्बी समय तक जीवित रहने में रोल को भारतीय वैज्ञानिको के साथ "एनवायर्नमेंटल साइंस एंड पोलुशन रिसर्च में प्रकशित किया जो कोरोना की वातावरण में व्यावहारिकता के बारे जानने में मदद कर रहा है।