Home एग्रीकल्चर न्यूज सूखे से खाद्यान्न उत्पादन में कमी की आशंका, किसान पलायन को मजबूर
सूखे से खाद्यान्न उत्पादन में कमी की आशंका, किसान पलायन को मजबूर
सूखे से खाद्यान्न उत्पादन में कमी की आशंका, किसान पलायन को मजबूर

सूखे से खाद्यान्न उत्पादन में कमी की आशंका, किसान पलायन को मजबूर

देश के करीब एक तिहाई भाग में सूखे जैसे हालाता बने हुए हुए हैं, किसानों को सिंचाई के लिए क्या पीने के पानी के भी लाल पड़े हुए है। जिस कारण कई राज्यों से लोग पलायन को मजबूर हैं। सूख के कारण फसल सीजन 2018-19 में खाद्यान्न उत्पादन में भी कमी आने का अनुमान है। पहले 5 वर्ष के दौरान मोदी सरकार ने तमाम वादों के बीच कृषि में नई योजनाओं की शुरुआत की। इन योजनाओं का क्रियान्वयन भी किया गया पर, तमाम प्रयासों के बावजूद भी कृषि विकास दर अपनी सबसे न्यूनतम स्तर पर चली गई है। वर्तमान में कृषि विकास दर 2.9 फीसदी है जिसे बढ़ाना केंद्र सरकार के लिए मुख्य चुनौती है।

देश के कुल 252 जिलों जोकि कुल जिलों के एक तिहाई सूखे से प्रभावित हैं। खरीफ मानसूनी सीजन 2018 में बारिश सामान्य से कम हुई थी जिस कारण महाराष्ट्र के 26 जिलों को सूखा घोषित किया हुआ है जबकि कर्नाटक के 24 जिलों में सूखा है। झारखंड के 18 जिलों में सूखे जैसे हालात बने हुए हैं तो गुजरात के 11 जिलों में सूखा पड़ा है। इसी तरह से राजस्थान के 9 जिलों में सूखे जैसे हालात है, जबकि आंध्रप्रदेश के 9 और ओडिशा के भी 9 जिलों में सूखा है।

भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के मुताबिक मानूसनी सीजन 2018 में बारिश में 9.4 फीसदी की कमी आई थी तथा यह लगातार पांचवा साल था जब बारिश में गिरावट देखी गई। आईएमडी के अनुसार इससे पहले वर्ष 2017 में भी देश के 202 जिलों में सामान्य से कम बारिश हुई थी, जबकि इसके पहले साल वर्ष 2016 में मानसूनी सीजन में देश के 36 सब डिवीजन में से 10 में बारिश सामान्य से कम हुई थी। सरकार भी समझती है कि कृषि क्षेत्र की समस्याओं को दूर किए बिना देश की अर्थव्यवस्था को रफ्तार नहीं दी जा सकती है। आज भी पूरी आबादी का 70 फीसदी से अधिक हिस्सा प्राथमिक क्षेत्र पर आधारित है। इसमें कृषि की भागीदारी काफी ज्यादा है।

देश के करीब 400 जिलों में खेती संकट

राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) अशोक दलवाई के अनुसार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीआर) की एक रिपार्ट आई थी, जिसमें खेती संकट की बात कही गई है। खेती संकट देश के करीब 400 जिलों में अलग-अलग है। कहीं कम है तो कहीं ज्यादा है। उन्होंने कहा कि देश में 140.1 मिलियन हेक्टेयर में खेती होती है, उसमें 52 फीसदी क्षेत्रफल असिंचित है तथा केवल 48 फीसदी ही सिंचित क्षेत्रफल है। सिंचित क्षेत्र में प्रति हैक्टेयर उत्पादकता औसतन 2.8 टन प्रति हेक्टेयर होती है जबकि असिंचित क्षेत्रफल में औसत उत्पादकता प्रति हेक्टेयर 1.1 टन हेक्टेयर की है। अत: जो अंतर है दोनों में वह 1.7 टन प्रति हेक्टेयर का है।

खाद्यान्न उत्पादन में भी कमी आने का अनुमान

कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2018-19 में खाद्यान्ना उत्पादन घटकर 28.33 करोड़ टन ही होने का अनुमान है जबकि इसके पिछले साल 28.50 करोड़ टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ था। इस दौरान गेहूं और चावल का तो रिकार्ड उत्पादन होने का अनुमान है लेकिन दलहन और तिलहन के उत्पादन में कमी आने की आशंका है। दलहन और तिलहन का उत्पादन कम होने से आयात पर निर्भरता बढ़ेगी। 

सूखा प्रभावित इलाकों से लोग पलायन करने को मजबूर

स्वाभिमान शेतकारी संगठन के नेता और पूर्व लोकसभा सदस्य राजू शेट्टी ने बताया कि महाराष्ट्र में 1972 से अब तक का सबसे भीषण सूखा पड़ा है। पानी की ऐसी कमी है कि गांवों की महिलाओं को कई-कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है। राज्य की 358 तहसीलों में से 151 तहसील सूखा प्रभावित घोषित की हुई हैं। राज्य के 13 हजार से ज्यादा गांव-बस्तियों में पानी का संकट है, पशुओं को चारा नहीं मिल रहा है। सूखा प्रभावित इलाकों से लोग पलायन करने को मजबूर हैं। मराठवाड़ा और विदर्भ में हालात ज्यादा खराब है, तथा राज्य के इन क्षेत्रों में हर साल सूखे के कारण हजारों किसान आत्महत्या जैसा कदम उठाते हैं।

चालू सीजन में मानसून के आगमन में हुई देरी

आईआईटी, गांधीनगर द्वारा चलाए जा रहे सूखा प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के अनुसार देश के 40 फीसदी से अधिक क्षेत्र में सूखे का सामना करना पड़ सकता है। इसमें से लगभग आधा क्षेत्र गंभीर से असाधारण सूखे की स्थिति का सामना कर रहा है। केंद्र सरकार ने पत्र लिखकर महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु को सलाह दी है कि वो समझदारी से पानी का इस्तेमाल करें। चालू मानसूनी सीजन में मानसून का आगमन ही 8 दिन की देरी से हुआ है। साथ ही कई राज्यों में प्री-मानसून की बारिश भी सामान्य से काफी कम हुई है। वायु चक्रवात ने भी मानसून की चाल को रोक दिया है इसलिए जल्द ही इस संकट ने राहत मिलने की उम्मीद भी कम है।

देश के कई जिलों में स्थिति चिंताजनक

गुजरात का कच्छ जिला लगातार तीसरे साल सूखे की चपेट में है। पिछले 20 साल के बाद ऐसा भीषण सूखा पड़ा है कि स्थिति भयावह हो चली है। बुंदेलखंड क्षेत्र में करीब 181 गांव में पेयजल संकट है, जिसकी वजह से लोग मजबूरन पलायन कर रहे हैं। ओडिशा के नौ जिलों के 5,633 गांवों को सूखा प्रभावित घोषित किया हुआ है। कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और राजस्थान के कई जिलों में पानी का संकट है। हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के भी कई जिलों में जलस्तर डार्क जोन में जा चुका है। घटते जलस्तर के कारण ही हरियाणा सरकार ने धान की खेती के बजाए मक्का और अरहर अगाने वाले किसानों को सहायता राशि देने की घोषणा की है।

जलवायु परिवर्तन और औसत तापमान में बढ़ोतरी से कई क्षेत्रों में सूखा

देश के लगभग हर भाग में लगातार बढ़ते जा रहे जल संकट से निपटने के लिए जल स्रोतों और जलाशयों, भूजल तथा सिंचाई संसाधनों का विवेकपूर्ण और उचित उपयोग सीखना होगा। बीते दशक में जनसंख्या वृद्धि, आर्थिक गतिविधियों और उपभोग की बदलती आदतों से वैश्विक स्तर पर जल की खपत हर साल एक फीसदी की दर से बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन और औसत तापमान में बढ़ोतरी की वजह से भी कई क्षेत्रों में सूखापन बढ़ रहा है।

वर्ष 2030 तक देश की 40 फीसदी आबादी इस गंभीर समस्या की चपेट में होगी

नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगले एक वर्ष में जलसंकट की इस समस्या से 10 करोड़ लोग प्रभावित होंगे, वहीं 2030 तक देश की 40 फीसदी आबादी इस गंभीर समस्या की चपेट में होगी। इस आसन्न संकट से निपटने के लिए ठोस पहल की जरुरत है। सूक्ष्म सिंचाई परियोजनाओं को प्राथमिकता, सूखा प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा देने, वर्षा जल का संग्रहण और पौधारोपण जैसे कार्यक्रमों को बढ़ावा देना होगा। जल प्रबंधन, कृषि, शहरी नियोजन और पारिस्थितिकी संरक्षण के लिए भी बड़े स्तर पर मुहिम चलानी होगी। पानी के संरक्षण, संग्रहण और उपयोग पर व्यापक नीति बनाने तथा केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय पर ध्यान दिये बिना जल संकट का दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता है।