Home एग्रीकल्चर न्यूज कृषि विज्ञानी डॉ. टी. हक का कोरोना से निधन, कृषि कानूनों के मौजूदा रूप को बताया था नुकसानदेह
कृषि विज्ञानी डॉ. टी. हक का कोरोना से निधन, कृषि कानूनों के मौजूदा रूप को बताया था नुकसानदेह
कृषि विज्ञानी डॉ. टी. हक का कोरोना से निधन, कृषि कानूनों के मौजूदा रूप को बताया था नुकसानदेह

कृषि विज्ञानी डॉ. टी. हक का कोरोना से निधन, कृषि कानूनों के मौजूदा रूप को बताया था नुकसानदेह

जाने-माने कृषि विज्ञानी डॉ. टी. हक का सोमवार को कोविड-19 महामारी के कारण निधन हो गया। उनकी विशेषज्ञता कृषि विकास से जुड़े नीतिगत मामलों में थी।

डॉ. हक अपने विचार खुलकर रखने के लिए जाने जाते थे। उन्होंने केंद्र सरकार के कृषि कानूनों का भी विरोध किया था। कहा था कि ये कानून सिद्धांत रूप से ही अच्छे हैं, छोटे और सीमांत किसानों की जमीनी हकीकत से इनका कोई वास्ता नहीं। उनकी राय थी कि जब तक छोटे और सीमांत किसानों को कोऑपरेटिव या उत्पादक समूह के रूप में संगठित नहीं किया जाता तब तक उन्हें ऐसे सुधारों का लाभ नहीं मिल पाएगा।

डॉ. हक ने भारत सरकार और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ कई दशकों तक काम किया। विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ), खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) जैसे शीर्ष संस्थानों में उन्होंने सलाहकार की भूमिका निभाई। इसके अलावा योजना आयोग, ग्रामीण विकास मंत्रालय, कृषि मंत्रालय के वर्किंग ग्रुप या एडवाइजरी बोर्ड में रहे। भारत सरकार के अलावा कई राज्य सरकारों की विशेषज्ञ समितियों में भी उन्हें सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया था। वे कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के चेयरमैन भी रह चुके थे। यही आयोग हर साल सरकार को फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की सिफारिश करता है।

कुछ समय पहले वे नीति आयोग में भूमि नीति पर बनी स्पेशल सेल के मानद चेयरमैन नियुक्त किए गए थे। भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में उनकी ख्याति भूमि विशेषज्ञ के रूप में भी है। वे 40 से अधिक देशों में काम करने वाले संगठन ‘लेंडेसा’ के भी सलाहकार थे। उन्होंने ग्रामीण विकास और कृषि नीतियों पर लंबा काम किया है। इन विषयों पर उनकी अनेक किताबें भी प्रकाशित हुई हैं।

जब केंद्र सरकार ने संसद में नए कृषि कानूनों से जुड़े बिल को पारित कराया था, तब डॉ. हक ने कहा था कि खासकर गेहूं और धान के लिए एमएसपी की व्यवस्था जारी रहनी चाहिए ताकि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून पर ठीक से अमल किया जा सके। इससे छोटे किसानों को उनकी उपज की उचित कीमत भी मिल सकेगी। उनका मानना था कि निजी कंपनियों अथवा निजी खरीदारों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर किसानों की उपज खरीदने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। वे किसानों की इस मांग से भी सहमत थे कि सरकार एमएसपी की लिखित गारंटी दे।