Home एग्रीकल्चर इंटरव्यू देश के 400 जिलों में कृषि संकट, एनआरएए बना रहा है एक्शन प्लान
देश के 400 जिलों में कृषि संकट, एनआरएए बना रहा है एक्शन प्लान
देश के 400 जिलों में कृषि संकट, एनआरएए बना रहा है एक्शन प्लान

देश के 400 जिलों में कृषि संकट, एनआरएए बना रहा है एक्शन प्लान

वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुनी का लक्ष्य लेकर चल रही, केंद्र सरकार के सामने देश में कुल खेती योग्य भूमि के 52 फीसदी असिंचित रकबे को सिंचित क्षेत्र में बदलना एक बड़ी चुनौती है। किसानों की आय बढ़ाने के लिए लागत में कमी करने के साथ उसकी फसल उचित दाम पर बिके, साथ ही खेती में मृदा एवं जल दो महत्वपूर्ण घटक हैं। इस दिशा में राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) तेजी से कार्य कर रहा है। देश में छोटी जोत के किसानों की संख्या ज्यादा है, अत: उनकी आय बढ़ाने के लिए उठाए जा रहे कदमों के साथ ही अन्य मुद्दों पर एनआरएए के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) अशोक दलवाई जोकि किसानों की आय दोगुनी करने के लिए गठित समिति के अध्यक्ष भी हैं, उनसे आउटलुक ने विस्तार से बातचीत की। कुछ अंश:


देश में खेती का करीब 8.6 करोड़ हेक्टेयर का रकबा वर्षा पर निर्भर है, अत: यह क्षेत्र सिंचित क्षेत्र में बदले तो खाद्यान्न उत्पादन में कितनी बढ़ोतरी संभव है?

देश में 140.1 मिलियन हेक्टेयर में खेती होती है, उसमें 52 फीसदी क्षेत्रफल असिंचित है तथा केवल 48 फीसदी ही सिंचित क्षेत्रफल है। सिंचित क्षेत्र में प्रति हैक्टेयर उत्पादकता औसतन 2.8 टन प्रति हेक्टेयर होती है जबकि असिंचित क्षेत्रफल में औसत उत्पादकता प्रति हेक्टेयर 1.1 टन हेक्टेयर की है। अत: जो अंतर है दोनों में वह 1.7 टन प्रति हेक्टेयर का है। ऐसे में असिंचित क्षेत्र, सिंचित में बदलने के बाद खाद्यान्न उत्पादन में करीब डेढ़ गुना से ज्यादा की बढ़ोतरी संभव है।

एनआरएए ने हाल ही में एक एटलस बनाया है, इससे किसानों को कैसे फायदा मिलेगा?

इससे यह पता चलता है, कहां पर खेती की कैसी स्थिति है, जैसे पानी हो या फिर भूमि हो। यही तो हम जानना चाहते है, हमारी जो खेती की पद्वति है, वह जोन के हिसाब से अलग-अलग है। मान लिजिए फसल को पानी मिला, तो किसान फसल की बुवाई में बदलाव कर देता है, लेकिन हो सकता है जमीन के हिसाब से यह बदलाव उचित नहीं हो? कई बार यह होता है कि पानी की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है फिर भी किसान फसल में बदलाव कर देता है। अत: खेती को मौसम के अनुसार जोड़ना जरुरी है। आजकल मौसम में बदलाव हो रहा है, मौसम बदलाव में भी दो बाते महत्वपूर्ण हैं। एक है रेनफाल पैटर्न में बदलाव होना। मान लिजिए देश में बारिश का औसत 1,170 मिलीमिटर है। बारिश तो 1,170 मिलीमिटर ही होगी मगर बारिश के दिन कम होकर 60 या 65 रह जायेंगे, इसका मतलब हमे वाटर मैनेजमेंट को बदलना पड़ेगा। वैसे भी मौसम में बदलाव आ रहा है। कहा जा रहा कि इस सदी में दो डिग्री तापमान बढ़ जायेगा, तो हम सबकी कोशिश यही है कि इसे एक डिग्री पर कैसे रोका जाए। इसलिए यह एलटस किसानों को यही जानकारी देगा, कि किस समय किस फसल की बुवाई करनी है तथा कब बारिश होगी। एग्रीइक्लोजी का मतलब यही होता है, सभी प्रकार के मौसम जैसे बारिश, आंधी या फिर उमस आदि की जानकारी देना? एटलस किसानों के लिए यही काम करेगा।

राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण के अनुसार किन राज्यों में प्राथमिकता के आधार पर काम करने की जरुरत है?

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीआर) की एक रिपार्ट आई थी, जिसमें खेती संकट की बात कही है। हमारा काम असिंचित क्षेत्र ही नहीं है, बल्कि अन्य क्षेत्र भी हैं जैसे बर्फबारी वाले क्षेत्र। असिंचित क्षेत्र तो इसका एक भाग है। मान लिजिए पूर्वोत्तर भारत के राज्य में जहां 200 मिलीमिटर बारिश होती है, वहां भी कुछ असिंचित क्षेत्र हैं। इसी तरह से ओडिशा हैं, जहां ज्यादा बारिश होती है लेकिन कुछ भाग असिंचित भी है। अत: जो खेती संकट की बात कही गई है वह देश के करीब 400 जिलों में अलग-अलग है। कहीं कम है तो कहीं ज्यादा है। आईसीआर ने इनमें से 150 जिलों को असिंचित चिहिंत किया है। अत: हमारा प्राधिकरण पहले इन 150 जिलों में काम करेगा?

देशभर के करीब 45 फीसदी हिस्से में सूखे जैसे हालात हैं, ऐसे में प्रभावित राज्यों में प्राधिकरण क्या कदम उठा रहा है?

देखिए सूखा जो तो होता है, वह तो मौसमी होता है। बारिश एक निश्चित मात्रा में होती है, अगर तय समय में बारिश सामान्य से कम होती है, तो सूखा घोषित किया जाता है। सूखा घोषित करने के बाद हमें मेमोरंडम दिया जाता है उसके बाद हमारी टीम प्रभावित क्षेत्रों में जाती है, और जांच करती है कि कितना नुकसान हुआ है उसके हिसाब से राज्यों को सहायता राशि दी जाती है। सूखा मैनेजमेंट के लिए आकस्मिक योजना तैयार होती है तथा सभी राज्यों के लिए आकस्मिक योजना बनती है।

देश में छोटी जोत के किसानों की संख्या ज्यादा है, अत: छोटी जोत के किसानों की आय कैसे बढ़ सकती है?

यह तो हमारे ढ़ांचे में ही कमी है कि हमारे यहां छोटे किसानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। छोटे-छोटे किसानों को मिलाकर फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी बनानी चाहिए। केंद्र सरकार ने भी कहा है कि 10 हजार फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी बनायेंगे, यह भी कम है। इससे भी ज्यादा होनी चाहिए। हर जगह पर फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी होनी चाहिए। इसके अलावा एक दो और चीज हैं जैसे मोर्डन लेज लीज एक्ट बनाया है ताकि जमीन लीज पर दी जा सके ना की लीगल पर। किसान के पास जमीन कम है तो उसे लीज पर दे दिजिए। इसके अलावा फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी बनाइयें ताकि आपका इनपुट मैनेजमेंट ठीक हो, आउटपुट मैनेजमेंट ठीक हो। कांट्रेक्ट फार्मिंग करके भी ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं।

प्राधिकरण ने अभी तक कितने हेक्टेयर क्षेत्रफल को कवर किया है?

पहले चरण में देशभर के लगभग 24 जिलों में यह योजना शुरू करेंगे। चालू खरीफ सीजन में देश के 12 जिलों से शुरूआत होगी। राजस्थान, आंधप्रद्रेश और कर्नाटक के 4-4 जिलों के लिए एक्शन प्लान तैयार किया है। राज्य के साथ जिला अधिकारियों के साथ मिलकर इस पर काम किया जा रहा है।

प्राधिकरण कई तरह की योजना चला रहा है जैसे माइक्रो सिंचाई परियोजना में पिछले साल 3,500 करोड़ रुपये खर्च हुआ था, जबकि उसके पहले साल में 2,400 करोड़ रुपये खर्च हुआ था। हर साल माइक्रो सिंचाई परियोजना के अंतर्गत एक मिलियन से दो मिलियन हेक्टेयर को सिंचित करने का लक्ष्य है। अत: अलग-अलग परियोजनाओं के हिसाब से पैसा खर्च होता है।