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खाद्य सुरक्षा: सुधर सकते हैं फिसड्डी राज्यों के भी हालात

AUG 21 , 2015
खस्ताहाल प्रशासन वाले राज्य भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त करने और भोजन का अधिकार अधिनियम को क्रियान्वित करने में सक्षम हैं- मध्यप्रदेश इसका नवीनतम उदाहरण है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) की दशा ठीक नहीं है। अधिनियम को लागू  हुए दो साल होने को आये लेकिन कुछ ही राज्य इसपर अमल कर पाये हैं। बाकी राज्य अब भी पात्र परिवारों की पहचान, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के सुधार तथा अन्य तैयारियों से जूझ रहे हैं। तो भी, हाल के सबूतों से संकेत मिलते हैं कि कुछ राज्य अधिनियम को बेहतर ढंग से लागू कर पाये हैं और इस मामले में पीछे रहने वाले राज्यों के लिए इससे कुछ महत्वपूर्ण सबक निकलते हैं।

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हैरानी की बात यह है कि बिहार इस मामले में अग्रणी है। एनएफएसए को लागू करने वाले शुरुआती राज्यों में से एक है बिहार। बिहार में पीडीएस भारत के सबसे ज्यादा खस्ताहाल में एक थी। सन् 2000 के पूरे दशक में बिहार के पीडीएस में 80-90 प्रतिशत की चोरबाजारी जारी रही। अपने पहले के अध्ययनों में हम बता चुके हैं कि बिहार में एनएफएसए का क्रियान्वयन पीडीएस में हुए बड़े सुधारों का सहगामी रहा है। पात्र परिवारों की सूची पहले की बीपीएल लिस्ट की तुलना में कहीं ज्यादा विश्वसनीय, युक्तिसंगत और समावेशी है। एनएफएसए के मेल में पीडीएस को सुचारु ढंग से चला पाने के लिहाज बिहार को अभी बहुत कुछ करना शेष है, तो भी, बिहार ने इस दिशा में जितनी प्रगति की है उसकी संभावना के बारे में एक दशक पहले तक सोचा भी नहीं गया था।

मध्यप्रदेश का अनुभव भी बड़ा दिलचस्प है। बिहार की तरह मध्यप्रदेश में भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली घटिया हुआ करती थी। योग्य परिवारों की सूची में दोष थे, नाम छूट जाने की गलतियां बहुत ज्यादा थीं, वितरण अनियमितता का शिकार था और चोरबाजारी बहुत ज्यादा थी। दो साल पहले पब्लिक इवैल्यूएशन ऑफ एन्टाइटलमेंट प्रोग्राम (“पीप”) के सर्वक्षण से पता चला कि मध्यप्रदेश के बीपीएल परिवारों को अपनी हकदारी का महज 37 प्रतिशत अनाज ही हासिल हो रहा है जो कि सर्वेक्षण में नमूने के तौर पर शामिल दस राज्यों के बीच खरीददारी और हकदारी के अनुपात के लिहाज से सबसे कम था। हालांकि सर्वेक्षण में सैंपल छोटा था (मंडला और शिवपुरी जिले के आठ गांवों के तकरीबन 200 परिवार) लेकिन सर्वेक्षण के निष्कर्ष राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के निष्कर्षों से मेल खाते हैं। इसके अतिरिक्त इन दो जिलों के हालात भी जाहिर कर रहे थे कि पूरे मध्यप्रदेश में पीडीएस संरचनागत रूप से भारी खामियों का शिकार है।

स्थिति बदली है कि नहीं यह देखने के लिए जुलाई में हमने फिर से उन्हीं परिवारों का जायजा लिया। इस बीच की अवधि में मध्यप्रदेश ने ग्रामीण इलाके की 80 प्रतिशत आबादी पर आधारित पात्र परिवारों की एक नई सूची बनाकर एनएफएसए को लागू करना शुरु कर दिया था। एनएफएसए के क्रियान्वयन के साथ-साथ राज्य सरकार ने पीडीएस को भी दुरुस्त करने के लिए गंभीर प्रयास किए। हमें उम्मीद थी कि नमूने के तौर पर चयनित दो जिलों में कुछ सुधार देखने को मिलेगा लेकिन हमें इन जिलों में जो देखने को मिला वैसा हमने सोचा भी नहीं था। तीन सुधार खास तौर पर ध्यान खींचने वाले थे।

पहला तो यही कि बिहार की तरह मध्यप्रदेश में भी एनएफएसए के अंतर्गत पीडीएस के विस्तार के साथ नाम छूट जाने की भूलों में भारी कमी आई है। सन 2013 के पीईईपी सर्वे में तकरीबन 50 फीसदी परिवार सार्वजनिक वितरण प्रणाली से बाहर थे। इन परिवारों के पास या तो एपीएल श्रेणी का राशनकार्ड था या फिर किसी किस्म का भी राशनकार्ड नहीं था। बाहर कर दिए गए परिवारों में बहुत से गरीब परिवार ऐसे थे जिन्हें गलत रीति से बीपीएल कार्ड से वंचित किया गया था। वजह थी, बीपीएल संबंधी सर्वेक्षण का गड़बड़ और अविश्वसनीय होना। आज पीप सर्वक्षण में शामिल ज्यादातर परिवारों के पास, जिनमें अनुसूचित जाति और जनजाति के तकरीबन सभी परिवार शामिल हैं, खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत नया राशनकार्ड है। पीडीएस का विस्तार-क्षेत्र 80 प्रतिशत आबादी तक होने तथा  पुरानी बीपीएल सूची की जगह राज्य के सामाजिक सुरक्षा मिशन के अंतर्गत तैयार ज्यादा विश्वसनीय डेटासेट के इस्तेमाल से, बहुत ही कम परिवार अब पीडीएस प्रणाली से बाहर हैं।

दूसरी बात यह कि नमूने के तौर पर चुने गए सभी गांवों में पीडीएस के तहत होने वाले अनाज के वितरण की नियमितता और विश्वसनीयता में बहुत ज्यादा सुधार हुआ है। सरकारी राशन दुकानों के पास अनाज वितरण का एक नियमित समय है और भले ही इसका कड़ाई से पालन नहीं होता हो तो भी महीने में समय से अनाज का वितरण एक मानक बन चला है। इस मामले में मध्यप्रदेश बिहार से कहीं आगे है। बिहार में, कई ज़िलों में, अन्‍न वितरण अपने निर्धारित समय से एक या दो महीने विलंब से हो रहा है। वितरण में निरंतरता ना होने से असुविधा और अनिश्चितता के हालात तो पैदा होते ही हैं, भ्रष्टाचार की भी गुंजाइश पैदा होती है क्योंकि लोगों के लिए अपनी पीडीएस हकदारी पर नजर रख पाना कठिन हो जाता है।

तीसरे, हमने देखा कि पीडीएस की अपनी हकदारी हासिल करने और धोखाधड़ी से बचने की लोगों की क्षमता में बहुत ज्यादा सुधार हुआ है। साल 2013 में खरीदारी और हकदारी का अनुपात 37 प्रतिशत था जो अब बढ़कर 96 प्रतिशत हो गया है यानि कुछ इतना अच्छा कि सहज विश्वास ही ना हो।  सर्वेक्षण में नमूने के तौर पर शामिल परिवारों को स्पष्ट पता था कि राशनकार्ड पर छपी जानकारी के अनुसार उन्हें कितनी मात्रा में अनाज हासिल करने का हक है। खरीद की कीमत एक रुपये प्रति किलो होने की वजह से लोग इस बात का खूब ध्यान रखने लगे हैं कि कीमत सस्ती होने की वजह से उन्हें अपने कोटे का पूरा राशन मिले। सिर्फ मध्यप्रदेश ही पहला राज्य नहीं है जिसे यह महसूस हुआ हो कि विस्तार-क्षेत्र बड़ा हो, हकदारी स्पष्ट हो और खरीद की कीमत कम रखी जाय तो इन सरल से उपायों (साथ ही पीडीएस में व्यापक सुधार) से चोरबाजारी पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है। एपीएल कोटा को चरणबद्ध ढंग से समाप्त करने के कारण भी कमियों को दुरुस्त करने में मदद मिली है। एपीएल कोटा में पारदर्शिता संबंधी बड़े दोष थे और उसमें चोरबाजारी भी व्यापक थी।

सर्वेक्षण के उत्तरदाताओं ने बहुत सी चिंताएं जताईं। कइयों की शिकायत थी कि नए राशनकार्ड के लिए उन्हें रिश्वत (100 से 2000 रुपये के बीच) देनी पड़ी। दूसरे, सामाजिक सुरक्षा मिशन का डेटाबेस इस तरह बनाया गया है कि जन्म या मृत्यु के पंजीकरण की स्थिति में परिवार के सदस्यों की सूची उसी हिसाब से अद्यतन हो जाय। इस प्रक्रिया ने स्थानीय अधिकारियों को रिश्वतखोरी का अवसर दिया है। तीसरे, पीडीएस के अनाज की गुणवत्ता एक सी नहीं है। तकरीबन एक तिहाई उत्तरदाताओं की शिकायत थी कि पीडीएस से पिछली दफे जो चावल मिला वह घटिया किस्म का था, जबकि तकरीबन 20 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने पीडीएस से हासिल गेहूं और मक्के के बारे में यही बात कही। इन सारी शिकायतों तथा अन्य बातों के बावजूद ज्यादातर उत्तरदाताओं का कहना था कि उन्हें दो साल पहले की तुलना में अभी पीडीएस से ज्यादा अनाज हासिल हो रहा है। 

ये निष्कर्ष एक छोटे से नमूने पर आधारित हैं और पूरे मध्यप्रदेश के लिए ये निष्कर्ष ठीक या बेठीक हो सकते हैं। शायद आगे और अनुसंधान से बातें ज्यादा स्पष्ट हों। बहरहाल, यह महत्वपूर्ण संकेत तो मिलता ही है कि खस्ताहाल प्रशासन वाले राज्य भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त करने और भोजन का अधिकार अधिनियम को क्रियान्वित करने में सक्षम हैं। इस मामले में मध्यप्रदेश की उपलब्धियां (यदि व्यापक सैंपल में भी साबित होती हैं) बिहार से मिले हालिया सबक के समतुल्य बैठते हैं। इन अनुभवों के आलोक में अन्य राज्यों में खाद्य सुरक्षा अधिनियम को क्रियान्वित करने की मांग उठाने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं।

(लेखकद्वय क्रमश रांची विश्वविद्यालय तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली से संबद्ध हैं। अनुवाद: चन्दन श्रीवास्तव) 

 

 




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