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"अंबेडकर जी! हम हैं क्योंकि आप थे"

APR 14 , 2017
126 साल पहले आज ही के दिन इस धरती पर ऐसे व्यक्ति ने जन्म लिया था जिसकी बदौलत आज मेरी गिनती इंसानों में होती है। मैं आज पढ़-लिख पा रहा हूं, शासन-प्रशासन में हिस्सेदार हूं और अपने अधिकारों को पहचानता हूं। मैं अक्सर सोचता हूं कि अगर उस वक्त डॉ अंबेडकर ना होते तो क्या आज मेरा आजाद वजूद होता? जवाब की कल्पना आप कर सकते हैं।

 

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- सुमित चौहान

डॉ. अंबेडकर 20वीं सदी के ऐसे महानायक थे जिन्होंने करोड़ों लोगों को ना सिर्फ इंसान का दर्जा दिलाया बल्कि संविधान के रूप में उनके बुनियादी मानवाधिकारों की गारंटी भी दी। 20वीं शताब्दी में पूरी दुनिया में उपनिवेशी शासन से लोगों को मुक्ति मिली, इस सदी में इंसान ने खुद को एक आजाद इंसान साबित करने और अपने अधिकारों के लिए जबरदस्त संघर्ष किया। अंग्रेजों ने भारतीयों को सिर्फ 200 साल तक गुलाम बनाके रखा लेकिन इस भारतीय उपमहाद्वीप में कुछ लोग ऐसे थे जिन्हें हज़ारों सालों तक गुलामी की ऐसी जंजीरों में जकड़ के रखा गया जिन्हें कोई तोड़ ना सका।

पढ़ने-लिखने की मनाही, सार्वजनिक कुओं और तालाब से पानी पीने की मनाही, संपत्ति नहीं रख सकते, बिना मजदूरी के जीवन भर काम करना, पशुओं से भी बदतर जीवन जीने के लिए मजबूर होना, ब्राह्मणवादियों का मल-मूत्र साफ करना और मरे हुए पशुओं की चमड़ी उधड़वाने का काम करने वाले शूद्रों को आजाद ख्याल इंसान बनाना क्या किसी उपनिवेशी महाशक्ति को हराने से कम है। देश की आजादी में लाखों-करोड़ों लोग साथ थे लेकिन लाखों-करोड़ों दलितों को वर्णवाद की दासता से आजादी दिलाने की लड़ाई डॉ अंबेडकर ने अकेले ही लड़ी।

चाहे महाड़ सत्याग्रह के जरिए दलितों को तालाब से पानी पीने का अधिकार दिलाने की बात हो या इंग्लैंड में गोलमेज सम्मेलन में भारत में दलितों के हक की नुमाइंदगी करने का मामला हो, डॉ अंबेडकर ने बिना रुके अपने संघर्ष को जारी रखा। तमाम विपरित परिस्थितियों के बावजूद खुद-पढ़ लिख कर अपने आप को इस काबिल बनाया कि वो बड़े से बड़े विद्वान से तर्क कर सकें। जरा सोचिए कक्षा में बाहर बैठकर पढ़ने को मजबूर एक छात्र को उस वक्त कैसा लगा होगा जब वो कोलंबिया यूनिवर्सिटी और लंडन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स की इमारत की सीढ़ियां चढ़ रहा होगा। एक छात्र के रूप में तमाम कठिनाईयों से लड़कर सफलता के शिखर पर पहुंचने तक डॉ अंबेडकर का जीवन आज के तमाम छात्रों के लिए प्रेरणादायक है। घर-बार छोड़कर अच्छी शिक्षा और रोजगार की तलाश में बड़े शहरों में संघर्ष करने वाले छात्रों को उनके छात्र जीवन के संघर्ष से प्रेरणा लेनी चाहिए।

डॉ अंबेडकर ने हिंदू धर्म द्वारा पोषित वर्णवाद की बखिया उधेड़कर रख दी। अपनी पुस्तक ‘जाति का खात्मा’ में डॉ अंबेडकर लिखते हैं ‘मैं हिंदूओं की आलोचना करता हूं, मैं उनकी सत्ता को चुनौती देता हूं इसलिए वो मुझसे नफरत करते हैं। मैं उनके लिए बाग में सांप की तरह हूं।’ शूद्रों को जिन धर्मग्रंथों को पढ़ने की इजाजत नहीं थी उन्हीं ग्रंथों द्वारा स्थापित वर्ण व्यवस्था और भेदभाव के सिद्धांतों को डॉ अंबेडकर ने अपने सवालों से धूल चटा दी।

अपनी पुस्तक ‘अछूत कौन थे और वो अछूत कैसे बने’ में डॉ अंबेडकर लिखते हैं ’सभी मनुष्य एक ही मिट्टी के बने हुए हैं और उन्हें यह अधिकार भी है कि वे अपने साथ अच्छे व्यवहार की मांग करें’। ऋग्वेद के पुरुषसुक्ता में जिन शूद्रों को ब्रह्मा के पैरों से उत्पन्न हुआ बताया गया है वहां मानव के प्राकृतिक अधिकारों की बात करना अपने आप में एक क्रांति है।

 महिलाओं को मातृत्व के अवकाश का अधिकार दिलाने से लेकर भारतीय रिजर्व बैंक की संकल्पना देने तक में डॉ अंबेडकर की आधुनिक सोच का परिचय मिलता है। हम उनके जीवन से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

आज जब दलित आगे बढ़ रहे हैं तो उनके सामने चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। जातिवाद का रोग अभी भी मनुवादियों में जड़े जमाए बैठा है। स्कूल-कॉलेज से लेकर दफ्तरों तक में जाति का दंश झेलने वाले दलितों को डॉ अंबेडकर का संदेश यादना रखा चाहिए। अपनी पुस्तक ‘गांधी और अछूतों का उद्धार’ में डॉ अंबेडकर ने लिखा है ‘दलित युवाओं से मेरा यह पैगाम है कि एक तो वे शिक्षा और बुद्धि में किसी से कम न रहें, दूसरे ऐशो-आराम में न पड़कर समाज का नेतृत्व करें। तीसरे, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी संभाले तथा समाज को जागृत और संगठित कर उसकी सच्ची सेवा करें’। 


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