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शास्त्री जी की मृत्यु का विवाद खत्म हो

JAN 11 , 2017
पंडित जवाहरलाल नेहरू की विरासत को भारत के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में संभालने वाले लाल बहादुर शास्त्री के निधन को 51 साल हो गए हैं, पर उनके परिवार के कुछ सदस्यों को आज भी संदेह है कि उनकी मृत्यु प्राकृतिक नहीं थी। ऐसे में शास्त्री जी के परिजनों को उनके साथ गए सहयोगियों द्वारा ताशकंद समझौते के विवरणात्मक तथ्यों को एक बार अवश्य देख लेने की आवश्यकता है।

लेखक सी.पी. श्रीवास्तव द्वारा लिखी गई पुस्तकों में शास्त्रीजी द्वारा ताशकंद में बिताए गए प्रतिदिन के क्रियाकलापों का विस्तृत विवरण उपलब्‍ध है। शास्त्री जी के सहयोगी सी.पी. श्रीवास्तव एवं सूचना सहायक कुलदीप नैयर समेत इंद्र मल्होत्रा एवं प्रेम भाटिया आदि द्वारा ताशकंद समझौते का बिंदुवार विवरण दिया गया है।

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शास्त्री जी की मृत्यु 11 जनवरी, 1966 को भारतीय समयानुसार रात्रि 2.02 बजे हुई थी। श्रीवास्तव के अनुसार 10 जनवरी तक शास्त्री जी तात्कालिक घटनाक्रम से संतुष्ट नजर आ रहे थे। सायं 4 बजे उन्होंने पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान के साथ ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर किए। श्रीवास्तव रात्रि 10.30 बजे शास्त्री जी के पास से प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के लिए गए। प्रेस कॉन्फ्रेंस के पश्चात उन्हें शास्त्री जी के व्य‌क्तिगत सहायक जगन्नाथ द्वारा यह सूचना मिली कि शास्त्री जी गंभीर रूप से बीमार हैं। श्रीवास्तव ने रात्रि 10.30 से रात्रि 1.32 तक के बीच पूर्ण घटनाक्रम के बारे में उनके सहायक जगन्नाथ सहाय, एम.एम.एन. शर्मा तथा उनके व्यक्तिगत स्टाफ से विस्तृत जानकारी ली। श्रीवास्तव के विवरणानुसार, जगन्नाथ सहाय ने शास्त्री जी का कमरा रात्रि 11.30 बजे छोड़ा, तत्पश्चात उनके सेवक राम नाथ ने उन्हें दूध दिया। राम नाथ को शास्त्री जी ने जाकर सोने के लिए कहा तब लगभग रात्रि 12.30 बजे रामनाथ, शास्त्री जी के कमरे से निकला। वह उनके दरवाजे पर आए और पूछा कि डॉक्टर कहां है। जगन्नाथ सहाय ने जवाब दिया कि बाबूजी वह यहीं पर सो रहे हैं। आप अपने कमरे में चलिए, मैं वहीं उन्हें ले कर आता हूं। शर्मा उन्हें कमरे तक छोड़ने के लिए उठे तथा उन्होंने शास्त्री जी की बांह पकड़ कर सहारा देना चाहा  परंतु शास्त्री जी स्वयं ही अपने कमरे तक चले गए और वहां जाकर जोर-जोर से खांसने लगे। शर्मा ने उन्हें लेटने के लिए कहा और वे लेट गए। सहाय तथा डॉ. चुग अपने दवाई के बक्से के साथ आए एवं शास्त्री जी की नब्ज परीक्षा कर उन्हें इंजेक्‍शन दिया। परंतु डॉक्‍टर ने हताशा में कहा, 'बाबूजी आपने मुझे मौका नहीं दिया।’

चलिए अब हम कुलदीप नैयर के द्वारा दिए गए तथ्यों को सुनते हैं।  विदाई कार्यक्रम में 10 जनवरी, 1966 को नैयर अंतिम बार शास्त्री जी से मिले। शास्त्री जी ने उन्हें बताया कि वापसी की यात्रा पर अयूब खान ने उन्हें पाकिस्तान आने के लिए आमंत्रित किया है। नैयर अपनी जीवनी में लिखते हैं, 'शास्त्री जी ने मुझसे ताशकंद समझौते पर भारतीय प्रेस की प्रतिक्रिया जानने को कहा था। मैंने उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें देखीं। इनमें से कुछ को समझा जा सकता था क्‍योंकि भारतीय पत्रकारों की प्रेस-वार्ता में कुछ पत्रकारों के सवाल कुछ ज्यादा ही चुभने वाले थे। भारत में भी राम मनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी तथा आचार्य कृपलानी जैसे विपक्ष के नेताओं ने ताशकंद समझौते की भर्त्सना की थी।’

कुलदीप नैयर फिर कहते हैं कि जगन्नाथ सहाय ने शास्त्री जी से उनके घर पर बात कराने के लिए पूछा क्‍योंकि उन्होंने पिछले दो दिनों से घर पर संपर्क नहीं किया था। शास्त्री जी ने पहले तो मना किया लेकिन फिर उनका विचार बदल गया। पहले उनके दामाद वी.एन. सिंह ने बात की परंतु वे कुछ ज्यादा नहीं बोले। उसके बाद शास्त्री जी ने बड़ी पुत्री कुसुम से बात की और पूछा, 'तुम्‍हें कैसा लगा?’ कुसुम ने उत्‍तर दिया, 'बाबूजी हमें अच्छा नहीं लगा।’ फिर उन्होंने अम्‍मा के बारे में पूछा क्‍योंकि घर में श्रीमती ललिता शास्त्री को इसी नाम से संबोधित किया जाता था। 'उन्हें भी अच्छा नहीं लगा’ कुसुम का उत्‍तर था। शास्त्री जी ने सोचा कि अगर घर वालों को अच्छा नहीं लगा तो बाहर वाले क्‍या कहेंगे। जगन्नाथ के अनुसार टेलीफोन की बातचीत ने शास्त्री जी को व्यथित कर दिया। वह बेचैनी से कमरे में इधर-उधर टहलने लगे। नैयर बताते हैं कि जैसे-जैसे दिन बीतते गए, शास्त्री जी के परिवार का संदेह बढ़ता गया कि उन्हें जहर दिया गया था। शास्त्री जी के जन्म दिवस 2 अक्‍टूबर पर 1970 में श्रीमती ललिता शास्त्री ने अपने पति की मृत्यु की जांच की मांग की। कांग्रेस पार्टी ने भी शास्त्री जी की मृत्यु की जांच की मांग का समर्थन किया। नैयर ने 1970 के अंत में मोरारजी देसाई से पूछा कि क्‍या वास्तव में वे ऐसा समझते हैं कि शास्त्री जी की मृत्यु स्वाभाविक थी, अथवा अप्राकृतिक थी। उन्होंने कहा कि यह सब केवल राजनीति है और मुझे पूर्ण विश्वास है कि कहीं भी कुछ संदेहजनक नहीं था।

 (लेखक भूतपूर्व थलसेना अधिकारी एवं राष्ट्रीय अल्पसंक्चयक आयोग के सदस्य हैं।)


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