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नक्सली गठजोड़ में प्रोफेसर को उम्रकैद

जीएन साईबाबा पर भारत के खिलाफ युद्ध का षडयंत्र चलाने का है आरोप
डीयू के प्रोफेसर जीएन साईबाबा

जी एन साईबाबा का शरीर कमजोर था पर दिमाग इतना तेज कि बड़े-बड़े विद्वान मात खा जाएं। इसी का परिणाम था कि आंध्र प्रदेश के गरीब परिवार से आए और 90 प्रतिशत दिव्यांग व्यक्ति को उसकी योग्यता के आधार पर दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज में नौकरी मिल गई। 2003 से साईबाबा ने यहां अंग्रेजी साहित्य पढ़ाना शुरू किया। मगर पढ़ाने के अलावा उनके रिश्ते नक्‍सलियों से बने। रिश्ते साधारण नहीं बल्कि वह उनके बौद्धिक सलाहकार बन गए। उन पर इनकी मदद करने और भारत के खिलाफ युद्ध का षडयंत्र चलाने के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। वह कॉलेज से निलंबित तो हैं ही अब उनके बर्खास्त होने की नौबत आ गई है। कुल मिलाकर कहें तो उन्हें देश के भविष्य को सुधारने के लिए नौकरी दी गई थी पर वह ऐसा नहीं कर सके और अपनी पद की गरिमा गिराई। उन्होंने स्वास्थ्य के आधार पर सजा से राहत मांगी पर जमानत के दौरान देश ही नहीं विदेशों में भी कई सेमिनारों में भाग लेते रहे।

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की एक विशेष अदालत ने माओवादियों से संपर्क रखने और देश के खिलाफ साजिश रचने के मामले में साईबाबा समेत पांच लोगों को दोषी ठहराया। इन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई। उम्रकैद की सजा पाने वालों में साईबाबा के अलावा जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र रहे हेम मिश्रा, प्रशांत राही, महेश तिर्की और पांडु नरोट शामिल हैं। छठे आरोपी विजय तिर्की को दस साल की सजा सुनाई गई है। विशेष अदालत के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसएस शिंदे ने सभी आरोपियों को विधि के विरुद्ध गतिविधियों में शामिल गैर-कानूनी गतिविधि (प्रीवेंशन) कानून की धारा 13, 18, 20, 38 और 39 का दोषी पाने के बाद यह सजा सुनाई है। विशेष लोक अभियोजक पी. साथियानाथन ने जिरह के दौरान कहा था कि स्वास्थ्य के आधार पर साईबाबा को किसी तरह की कोई छूट न दी जाए। निशक्‍तता के बावजूद उन्होंने भारत और विदेश में कई सम्‍मेलनों और सेमिनारों में हिस्सा लिया है, जिनके जरिए उन्होंने कथित रूप से माओवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार किया है।  साईबाबा को दी गई सजा के बाद उनकी पत्नी वसंता ने कहा है कि वह सजा के खिलाफ नागपुर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगी। डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट की सदस्य नंदिता नारायण का मानना है कि साईबाबा ऊपरी अदालत में निर्दोष साबित होंगे। वह मानवाधिकार और जनजातीय लोगों के अधिकारों की लड़ाई लडऩे वाले व उनकी आवाज उठाने वाले हैं। जबकि राष्ट्रवादी शिक्षक संघ के संयोजक डॉ. प्रमोद शास्त्री ने कहा कि नक्‍सलियों के सहायक साईबाबा को दोषी करार दिए जाने से वामपंथियों के चेहरे से झूठ का मुखौटा हटा है और उनका असली चेहरा समाज के समक्ष स्पष्ट हुआ है।

साईबाबा जब दिल्ली आए थे तो उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह खुद के लिए व्हील चेयर तक खरीद सकें। उनका नाम नक्‍सलियों से रिश्ते को लेकर तब सामने आया जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र हेम मिश्रा ने गिरक्रतारी के बाद पुलिस को बताया था कि वह नक्‍सलियों और प्रोफेसर के बीच कुरियर का काम करता है। हेम के पास पुलिस को ऐसे दस्तावेज मिले थे जिनमें साईबाबा का जिक्र था। हेम मिश्रा को महेश तिर्की और पांडु नरोटे के साथ गढ़चिरौली जिले के अहेरी से अगस्त, 2013 में पुलिस ने पकड़ा था। उससे मिले सुराग के आधार पर ही प्रशांत राही और विजय तिर्की को गोंडिया जिले के दियोरी से गिरक्रतार किया गया था। साईबाबा को गढ़चिरौली पुलिस ने मई 2014 में प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) का सदस्य होने, समूह के लिए नियुक्तियां करने और रसद मुहैया कराने के आरोप में गिरक्रतार किया था। गिरक्रतार होने के पहले साईबाबा ने अखिल भारतीय पीपुल्स रेजिस्टंस फोरम (एआईपीआरएफ) के कार्यकर्ता के रूप में कश्मीर और देश के उत्तर-पूर्व हिस्से में मुक्ति आंदोलनों के समर्थन में दलित और आदिवासी अधिकारों को लेकर प्रचार करने के लिए करीब दो लाख किलोमीटर से अधिक की यात्रा की थी। गिरक्रतारी के बाद उन्हें नागपुर की उसी अंडा जेल में 14 महीने तक रखा गया था जिसमें मुंबई हमले के गुनहगार पाकिस्तानी आतंकी कसाब को रखा गया था।

उम्र कैद की सजा पाए हेम मिश्रा को प्रतिबंधित भारतीय कम्‍युनिस्ट पार्टी (माओवादी) संगठन में बुद्धिजीवी कमांडर का दर्जा प्राप्त था। उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के बूंगधार बाड़ेछीना का रहने वाला हेम मिश्रा 1996 से ही प्रगतिशील छात्र मंच का सदस्य रहा है। उसने जेएनयू से चीनी भाषा में डिप्लोमा हासिल किया है।

 

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