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क्रिकेट का शकुनि

वह आज तक न समझ पाया था कि उसके माता-पिता ने उसका नाम शकुनि क्यों रखा था। माता-पिता का तो वह हमेशा लाड़ला रहा था। बचपन से पांसे फेंक कर जीतने का वह शौकीन था। पर केवल इसी कारण तो उसका नाम शकुनि नहीं रखा गया होगा। चलो, मैं क्यों फिक्र करूं, वह मन ही मन बुदबुदाया। वैसे भी नाम में क्या रखा है? फिर पांसे फेंकर कर जीतना भी कला है। इस में एकाग्रता, कल्पना शक्ति, आत्मविश्वास और अपनी काबिलियत में भरोसे की भी अत्यंत आवश्यकता होती है, तभी तो आप जीत सकते हैं।
क्रिकेट का शकुनि

बचपन की पांसे फेंक कर जीतने की आदत ने आज उसे एक अलग ही मोड़ पर खड़ा कर दिया था। आज न केवल वह अपने क्लब की क्रिकेट टीम का सदस्य था, बल्कि कप्तान भी बन चुका था। भाग्य को प्रतिभा से प्रबल मानना उसकी बचपन की आदत थी। वाचालता को व्यवहार कुशलता समझना और चालाकी को बुद्धिमानी मानना भी उसके खून में समा चुका था। क्रिकेट के मैदान पर वह कम बोलता था, पर उसकी आंखों की चमक जीत और हार के साथ बदलती रहती थी। वह जिस क्लब के लिए खेलता था, उसके पास अथाह धनराशि थी। इस क्लब के साथ कई औद्योगिक घरानों के कर्ता-धर्ता, राजनीतिज्ञ और फिल्म स्टार जुड़े थे। क्लब क्रिकेट की अखिल भारतीय चैंपियनशिप में जीत जाने के लिए ये सभी हस्तियां व्याकुल रहती थी। शकुनि अपनी भविष्यवाणियों से इन जीतों के प्रति तमाम महत्वपूर्ण शख्सियतों को प्रभावित करता रहता था। एक कप्तान की तरह उसकी योग्यता की खूब चर्चा होती थी। बल्लेबाज तो वह अव्वल ही था, पर कप्तान की भूमिका में मैंचों को पलट देने की उसकी क्षमता अखबारों में चर्चा का विषय बनी हुई थी।

पहली बार जब मैचों को फिक्स करने का प्रस्ताव उसके पास आया था, वह स्तब्ध रह गया था। तब क्रोधित होने के बजाय उसने अवसरों और संभावनाओं को तलाशने की कोशिश की थी। शान और शौकत उसकी भीतरी कमजोरी थी, पर इस बात को उसने कभी जाहिर नहीं होने दिया था। अभावों में बीतती जिंदगी से उसे नफरत-सी हो चली थी। वह भी बड़ा आदमी बनना चाहता था। जिंदगी छोटी होती है और अवसर होते है कम। तिस पर प्रतिस्पर्धा भी कड़ी होती जा रही थी। उसे मालूम था, मेहनत कर के बड़ा आदमी बनने में जिंदगी का कीमती वक्त हाथ से निकल जाएगा। किसी को कानो-कान खबर भी न लगे और आप बड़ी हस्ती बन कर उभरें-इसका मजा ही कुछ और है। इस मनोविज्ञान के साथ उसने पहला बड़ा पांसा फेंकने की ठान ली। अगले सप्ताह उसके कुशाग्र क्रिकेट क्लब का फाइनल मुकाबला मुरुगन क्रिकेट क्लब से था। सारे देश में इस मुकाबले की चर्चा थी। टेलीविजन चैनल ने सीधे प्रसारण की व्यवस्था भी की थी। उसने टॉस से ही यानी फेंकने से ही बड़े बनने की यात्रा की शुरुआत की। टॉस पर बड़ा सट्टïा होता है। उसने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा कदम उठाते हुए टॉस हारने के लिए 30 लाख रुपये की पेशकश को स्वीकार कर लिया। मुरुगन क्रिकेट टीम के कप्तान कुरुपन ने सिक्का उछाला और शकुनि ने हेड कहा। इसके पहले के कुरुपन या मैच रैफरी कुछ देख पाते शकुनि ने फुर्ती से सिक्का जमीन से उठा कर कहा, ‘बधाई, आप टॉस जीत गए।’ ‘पर मैंने तो सिक्का देखा ही नहीं’, जब मुरुगन ने कहा तो वाचाल शकुनि ने तुरंत समझा दिया, ‘फायदा तो आपको ही है। मैं भला झूठ क्यों बोलूंगा।’

बात भले ही आई-गई हो गई पर शकुनि तीस लाख रुपये की भारी कमाई कर चुका था। उसे मालूम था कि वह एक नई दुनिया में प्रवेश कर चुका था। वह अपने मन को समझा चुका था कि अपराधी तब तक अपराधी नहीं होता, जब तक वह पकड़ा न जाए। पकड़े जाने की संभावनाएं न के बराबर थीं। अपनी योजनाओं को और कारगर बनाने की सोच में वह भिड़ गया। शकुनि ने महसूस किया कि जीवनशैली बदल जाने के बाद अब लोग उसकी तरफ आकर्षित हो रहे हैं। उसके कपड़े बेहतर हो गए। उसके चेहरे पर चमक आ गई। खूबसूरत लड़कियां उस पर डोरे डालने लगीं थीं। ‘यह हुई न कुछ बात’, शकुनि मन ही मन बुदबुदाया। रुपयों की खनक में बड़ी ताकत होती है। उसके साक्षात्कार अखबारों में प्रमुखता के साथ छपने लगे। उसकी कप्तानी की भूरि-भूरि प्रशंसा होने लगी।

अब वह अपने अगले बड़े कदम की प्रतीक्षा करने लगा। पर शंका की सुई कभी-भी उसके ऊपर मुड़ सकती है। शीघ्र ही मौका भी आ गया। क्लब चैंपियनशिप के नॉक आउट मुकाबले में उसने अपनी टीम की हार का दांव लगा लिया था। अगर उसका दांव सफल रहता है, तो उसे एक करोड़ रुपये मिलने वाले थे। पूरा स्टेडियम उस दिन खचाखच भरा हुआ था। बहुत ही दिलचस्प कांटे का मुकाबला था। कुशाग्र क्लब के लिए शकुनि ने टॉस जीत कर बल्लेबाजी का निर्णय लिया और निर्धारित 20 ओवरों में 136 रन बनाए। स्वयं शकुनि ने 20 गेंदों पर 36 रन बना कर वाह वाही लूटी।

जवाब में 19.5 ओवरों में खंडूरी क्रिकेट क्लब के 134 रन बन चुके थे। आखिरी गेंद पर तीन रन बना कर ही खंडूरी क्रिकेट क्लब जीत सकता था। तब क्षेत्र रक्षण जमाते वक्त गेंदबाज रमन्ना और मिड ऑफ पर खड़े करतार से शकुनि ने बात की। आज उन्हें जिता दो यार, शकुनि ने उन्हें समझाया। एक ही गेंद का सवाल है, दोनों को दस-दस लाख रुपये दिलवा दूंगा। दोनों स्तब्ध रह गए। पर आखिर कप्तान की बात मान गए। रमन्ना ने आखिरी गेंद को ऑफ और मिडिल स्टंप की लाइन में किया और बल्लेबाज केवल सामने पुश कर पाए। रमन्ना ने योजना के तहत गेंद को फील्ड नहीं किया और बल्लेबाज एक रन के लिए दौड़ पड़े। उधर मिड ऑफ से आकर करतार ने गेंद को फील्ड किया और पास आकर गेंदबाज को देता या विकेट उखाड़ देता तो उनकी टीम जीत जाती। पर उसने वैसा नहीं किया और जोर से स्टंप की ओर थ्रो किया, यह जताने के लिए कि सीधे थ्रो से रन आउट करना चाहता है। बस उस ओवर थ्रो से खंडूरी क्रिकेट क्लब के बल्लेबाजों ने दो रन और ले लिए और मैच जीत लिया। शकुनि ने अपनी कप्तानी में मैच हारा, पर वह इनाम जीता, जिस की उसे तमन्ना थी।

जिस तरह से भले लोग अच्छे लोगों को ढूंढ निकालते हैं और उनकी आपस में बनने लगती है, उसी तरह से बेईमान निगाहें बेईमान साथियों को ढूंढ निकालती हैं और उनकी भी एक अलग जमात बन जाती है। बेईमान जमात आनन-फानन में कमाई गई संपत्ति पर गर्व करती है और ईमानदारों को ओछी दृष्टि से देखती है। शकुनि भी यही सोचता था। मेहनत, लगन, एकाग्रता जैसी चीजें उसे रास नहीं आती थीं। उसकी चालाकी उसके नाम के भी आगे निकल रही थी। वह फिक्सिंग के तरीके भी बदलने लगा, फिक्सिंग से ज्यादा लोगों को शामिल करने के वह खिलाफ था। पर क्रिकेट एक टीम का खेल है। अत: कुछ लोगों को शामिल किए बिना काम नहीं चलता था।

उसने एक दांव स्पॉट फिक्सिंग पर भी लगाया। बहुत ही महत्वपूर्ण मैच में उसने हार के लिए दांव लगाया। रमन्ना को गेंदबाजी दी। आखिरी ओवर चल रहा था और विरोधी टीम को जीत के लिए केवल एक रन की दरकार थी। बल्लेबाज ने पांच गेंदें बिना रन लिए ही रक्षात्मक तरीके से खेल दी। तब शकुनि का माथा ठनका। कहीं बल्लेबाज ने भी हार जाने के लिए मैच तो नहीं फिक्स कर रखा है। यह सोच कर ही उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसका शातिर दिमाग फिर भी अपना काम तेजी से कर रहा था। शकुनि ने रमन्ना को पास बुलाया और कहा कि लंबी नो बॉल कर दो। रमन्ना ने वैसा ही किया और अंपायर के नो बॉल करते ही शकुनि की कुशाग्र क्रिकेट टीम हार गई। उनके समर्थक मायूस हो गए, पर शकुनि मन ही मन प्रसन्न था।

जहां-जहां इंसान है, शोहरत है, मुकाबला है, प्रतिस्पर्धा है, दौलत है, वहां-वहां शकुनि नाम का चरित्र अलग-अलग रूप में मौजूद जरूर है। चाहे वह व्यवसाय हो, राजधर्म हो या क्रिकेट का मैदान। तमाम शरारतों के बाद भी ऐसे शकुनि कभी न कभी पकड़े जरूर जाते हैं। अगर न पकड़े जाएं तो समझ जाइए यह कलियुग है भाई।      

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