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‘प्रबंधकाव्य न भी मानें, तो एक काव्यप्रबंध है इंद्रप्रस्‍थ में’

‘महाभारत के बहाने आज की नारी की संघर्षगाधा को शब्द देती है, वरिष्ठ कवि उपेन्द्र कुमार की काव्य-कृति इंद्रप्रस्‍थ ।’ कल शाम पुस्तक मेला के सेमिनार मंच पर कृति-चर्चा में शामिल विद्वान वक्ताओं ने कहा।
‘प्रबंधकाव्य न भी मानें, तो एक काव्यप्रबंध है इंद्रप्रस्‍थ में’

   मान्य काव्यस्वरूपों की सीमा में सायास न बांधते हुए मापदंडों से हट कर देखें तो महाभारतकाल को अपने समय के नजरिए से रचने का कृतिकार का प्रयास सफल रहा है। वरिष्ठ ‌कवि उपेन्द्र कुमार के काव्यप्रबंध इंद्रपस्‍थ पर बोलते हुए आलोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा, महाकाव्य, खंडकाव्य आदि के पचड़े में न पड़ें तो इसे कामायनी की परंपरा की रचना कह सकते हैं।

   सबद निरंतर से अलग पहचान बनाने वाले वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने कहा, विस्फोट जैसे गुरु-गंभीर शब्द का इस्तेमाल न करें तो भी कृति में एक विशिष्ट वैचारिक प्रस्फुटन तो है। प्रबंधकाव्य है कि नहीं, इसमें मैं पड़ना नहीं चाहता। अलबत्ता इसमें दो समयों—महाभारत और आज के समय, में आवाजाही है, जिसके जरिए कवि ने एक सशक्त काव्यप्रबंध रचने का प्रयास किया है। वैसी ही जैसी निराला की राम की शक्तिपूजा है। जहां तक इंद्रप्रस्‍थ के कथ्य की बात है, तो इसमें पहली बार तकरीबन महाभारत के सभी नारी पात्रों के अंतर्लोक को आज के समय में रचा गया है। जब कि पहले आई तमाम रचनाओं में अलग-अलग पात्रों को लिया गया है। वर्णित प्रेम के अभाव को आज भी शिद्दत से देखा-महसूसा जा सकता है। यह महाभारत कथा का पहला स्‍त्रीपाठ है। इसे उर्वशी की परंपरा में नहीं रखा जा सकता, लेकिन मैं ‌त्रिपाठी जी से सहमत हूं कि यह कामायनी के अधिक निकट है और करुणा और संघर्ष, प्रेम और राजनीति का सार्थक काव्य है।       

   नंद भारद्वाज ने कहा कि महाभारत, रामायण पर अक्सर लोग आस्‍था के नाते अछविकारी सच पर प्रश्न नहीं उठाते, लेकिन उपेन्द्र जी ने उन सवालों को उठाने का साहस किया और भरसक निभाया है। द्रोपदी को यथोचित सम्मान न मिलने की पीड़ा को आज के संदर्भ में बखूबी रचा गया है।

  शानी रचनावली के संपादक जानकी प्रसाद शर्मा ने कहा, यह महाकाव्य है कि नहीं, यह प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि इसमें हमारे समय की उपस्थिति किस हद और रूप में है। इसे पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि इसमें वैश्वीकरण दौर में बन रहे समाज के प्रतिनिधि अपने जा-ब-जा रूप में सटीक नज़र आते हैं।

   रचनाकार उपेंद्र कुमार ने बताया कि इसमें करुणा की धारा है, तो प्रेम की तासीर भी है। सहज-सरल लिखा है, ताकि आम पाठक के सिर के ऊपर से न गुजरे। समाज पर असर की बात पर उन्होंने कहा कि कविता किसी समस्या का हल नहीं देती, इशारे में अपनी बात कहती है, जिससे हल का रास्ता निकाला जा सकता है।

   धन्यवाद ज्ञापन के बहाने फिल्म और साहित्य दोनों में दखल रखने वाले रामजी यादव ने कहा, सौंदर्य वर्णन और पठनीयता के साथ ही भीतर की भीभस्तता पर भी कवि की पैनी नज़र है। इंद्रप्रस्‍थ की भव्यता है तो उसके भीतर शासकों की पतनशीलता भी उघाड़ी गई है। द्रोपदी और अर्जुन के द्वंद्व में आज का द्वंद्व भी है।

   अनंत विजय के संचालन में हुई चर्चा में भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक, लीलाधर मंडलोई, कथाकार महेश कटारे, पंजाबी की भूपेंद्र कौर ‘प्रीत’, जनार्दन मिश्र, अपर्णा आदि मौजूद थे।

   

    

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