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जूआ खेलना कानूनी हुआ तो घरों के घर बरबाद होंगेः कीर्ती आजाद

AUG 29 , 2016
देश में प्रभावशाली लोगों का एक तबका सट्टेबाजी और जूए को वैध बनाने की पुरजोर कोशिशों में जुटा है। इनमें नौकरशाही और बड़े कारोबारी शामिल हैं। बीते दिनों दिल्ली में आयोजित ऑल इंडिया गेमिंग फेडरेशन (एआईजीएफ) के उद्घाटन समारोह में इसकी एक झलक देखने को मिली जब सीबीआई के पूर्व निदेशक रणजीत सिन्हा ने सट्टे और जूए को वैध बनाने की पुरजोर वकालत की। वहीं पूर्व क्रिकेटर और लोकसभा सांसद कीर्ती आजाद ने इसकी यह कहकर मुखालफत की कि इससे गरीब आदमी आर्थिक तौर पर और बर्बाद हो जाएगा। कार्यक्रम में एकमात्र कीर्ती आजाद ऐसे थे जिन्होंने देश में सट्टे और जूए को कानूनी मान्यता देने का विरोध किया। इस मौके पर कीर्ती आजाद से खास बातचीतः

भारत में इस समय एक बहस जारी है कि जूए या सट्टे को कानूनी मान्यता दे दी जाए, इसपर आपकी क्या राय है?

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जूए को जिन-जिन राज्यों में कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए,वहां-वहां मिली हुई है। मेरी ऐसी धारणा है कि जो लोग जूआ खेलना चाहते हैं, वे पूर्वोत्तर और गोवा जैसे राज्यों में जा सकते हैं (पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों और गोवा के एक पानी वाले जहाज पर जूआ खेला जा सकता है।)। लेकिन पूरे देश में जूए को कानूनी मान्यता मिलना, यह एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है।

 

बड़ा प्रश्नचिन्ह कैसे?

क्योंकि सामाजिक और आर्थिक तौर पर यह सही नहीं होगा। कुछ वर्ष पहले दिल्ली में सिंगल डिजिट लॉटरी चलती थी। मुझे ध्यान है क्योंकि मैं उस समय वर्ष 1993 में विधायक था। इसी गोल मार्केट एरिया की बात है जो बाद में नई दिल्ली बनी और शीला दीक्षित वहां से जीती और मुख्यमंत्री बनीं थी। रीगल के पास, कनॉट प्लेस, चाणक्यापुरी, चाणक्या सिनेमा के पास, सरोजनी नगर में लोग सिंगल डिजिट लॉटरी बेचते थे। शाम के समय वहां मेहनतकश लोग जाते थे जो दिनभर की कमाई होती थी, एक पउआ खरीद लेते थे और सारी दिनभर की कमाई शराब और जूए में बरबाद कर देते थे। लोगों के बीच में अभी इस जूए को कैसे लाना है यह बहुत बड़ा प्रश्न है। क्योंकि जूआ खेलने को लेकर हमारे देश में लोग अभी इतने परिपक्व नहीं हुए हैं जितने पश्चिम के देशों में हैं। आप अमेरिका जाएं, ऑस्ट्रेलिया जाएं इन सब देशों में जूए का एक स्वरूप बना हुआ है। लोग इतना ही खेलते हैं जितनी उनकी औकात रहती है।  

 

खासकर क्रिकेट के समय सट्टाबाजार खूब गरम रहता है, जब गैर कानूनी तरीके से सब चल रहा है तो क्यों न इसे कानूनी मान्यता दे दी जाए?

मेरा यह कहना है कि आज भी 80 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं या उसके आसपास हैं। क्या हम इसे ओपन कर उन्हें एक्सपोस नहीं कर रहे हैं, इसे बुराई कहिए या अच्छाई कहिए जो भी कहिए लेकिन मैं इसे आर्थिक और सामाजिक  दृष्टि से देखते हुए यही कह सकता हूं कि यह लोग जो कमजोर तबके से हैं क्या इनके घर नहीं बिगाड़े जाएंगे, अब कहने को तो यह भी कह सकते हैं कि दशहरे से दिवाली तक 20 दिन घरों में दो नंबरी पैसा प्रयोग होता है। जूआ और ताश चलता रहता है। उसका भी तो कोई जवाब होना चाहिए। केवल यह कह देना कि वहां चल रहा है, यहां चल रहा है, हां हो रहा है मैं मानता हूं।

यह सट्टा कहां से कहां चलता है, यानी इसका रूट क्या है?

इसके अंदर एक बहुत जबरदस्त ट्राएंगल बना हुआ है। दुबई, कराची और मुंबई का ट्राएंगल है यह। मैं मानता हूं लेकिन जूए को कानूनी मान्यता देने के लिए बेहद चर्चा की जरूरत है। उसी से निकल कर आएगा कि क्या हमें जूआ खेलना चाहिए या नहीं खेलना चाहिए, खेलना चाहिए तो उसके मानक क्या होंगे।

       


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