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आवाज न उठाता तो नकली पत्रकार बनताःदेवांश मेहता

इन दिनों सेंट स्‍टीफन कॉलेज के छात्र देवांश मेहता सुर्खियों में हैं। दर्शनशास्त्र, तृतीय वर्ष के इस छात्र ने अपनी साख, सम्मान और अपने पर लगे आरोपों को पूरे कॉलेज के सामने खारिज करने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्याय मिल भी गया। देवांश अपनी जीत से काफी खुश है। उनका कहना है कि कोई कितना ही ताकतवर और ऊंची कुर्सी पर क्यों न बैठा हो, जुल्म के खिलाफ हर हाल में आवाज उठानी चाहिए। अपनी जीत के मौके पर देवांश ने आउटलुक से खास बातचीत कीः
आवाज न उठाता तो नकली पत्रकार बनताःदेवांश मेहता

  • वैसे तो इस मामले पर मीडिया में आ रहा है लेकिन आपसे जानना चाहती हूं ?

सेंट स्टीफन के प्रिंसीपल हर चीज पर अपना नियंत्रण चाहते हैं। वह चाहते हैं सब उनकी मर्जी से हो। वह यह भी चाहते हैं कि कॉलेज से कोई बात बाहर न जाए सब अंदर ही अंदर रहे।

  •  तो मामला क्या था?  

हमने स्टीफन वीकली नाम से एक ऑनलाइन मैग्जीन शुरू की। जिसके लिए पहले ईशू में हम प्रिंसीपल का इंटरव्यू चाहते थे। उन्होंने इंटरव्यू दिया भी लेकिन कहा कि इस मैग्जीन में स्टाफ और छात्रों की बराबर सहभागिता होनी चाहिए। हम इसमें कॉलेज स्टाफ की सहभागिता नहीं चाहते थे क्योंकि तब तो छात्र हम पर विश्वास नहीं करते। वे सोचते कि हम प्रिंसीपल के माउथ-पीस हैं। प्रिंसीपल ने यह भी कहा कि मैं इसमें सलाहकार हो जाता हूं। फिर मैग्जीन लॉन्च होने का दिन आया। हमने प्रिंसीपल को उनका इंटरव्यू पढ़ने के लिए भेजा लेकिन कोई जवाब नहीं आया। हमने सोचा कि शायद कोई बदलाव नहीं होगा इसलिए ही प्रिंसीपल ने कुछ नहीं बोला। लॉन्चिंग की तारीख के अनुसार हमें मैग्जीन लॉन्च करनी थी। क्योंकि सारा कॉलेज इसे जानता था। हमने इसके बारे में खूब प्रचार जो किया था। खैर इंटरव्यू छप गया। इसपर नाराज प्रिंसीपल ने मेरे खिलाफ एक्शन ले लिया। नोटिस बोर्ड पर लगा दिया कि हमारी मैग्जीन पर पाबंदी लगाई जा रही है। मेरे खिलाफ एक आदमी की जांच कमेटी बिठा दी। बोला गया कि माफी मांग लो। जब मैं इन मामले को लेकर मीडिया में गया तो मुझे सिसपेंड कर दिया गया।

  •  उसके बाद क्या हुआ ?

मुझे माफी नहीं मांगनी थी। मेरे पेरेंट्स ने मुझसे कहा कि अगर तुम्हारे मन से माफी नहीं निकल रही है तो कभी माफी मत मांगो। वे मेरे साथ थे। मेरा दाखिला न्यूयॉर्क के कोलंबिया स्कूल में पत्रकारिता में हो चुका है। अगर मैं सिसपेंड रहता तो मेरा भविष्य खराब हो जाता। मैं ग्रेजुएशन कार्यक्रम में भाग न ले पाता। मैं अपने दोस्तों की सलाह से सुनील मैथ्यु, रीजा वर्गीस और आंखी घोष के पास गया। ये वकील हैं और इन्होंने निशुल्क मेरा केस लड़ा। न्यायलय ने माना कि मुझे कॉलेज से निकालना गैर कानूनी था।

  •  सबसे ज्यादा गुस्सा कब आया?

मुझे दर्शनशास्त्र विभाग की तरफ से अनुशासन और विभिन्न कॉलेज कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए अवॉर्ड दिया गया। प्रिंसीपल ने वो अवॉर्ड मुझसे छीनकर किसी और को दे दिया।  

  • अब क्या सोचा है?

इस चक्कर में पढ़ाई बहुत खराब हो चुकी है। अब पढ़ना है। उसके बाद न्यूयॉर्क जाकर पत्रकारिता करनी है। पत्रकार बनकर बोलने की आजादी, गरीबों और हाशिए के लोगों के लिए काम करना है।

  • इतनी कम उम्र में इतना जज्बा कैसे आया?

जब मुझे सिस्पेंड किया गया तो मुझे लगा कि अगर मैं चुपचाप बैठ गया तो जीवन में बहुत घटिया, दब्बू और नकली पत्रकार बनूंगा। अगर मैं अपने लिए नहीं लड़ सका तो किसी दूसरे के लिए क्या लड़ूंगा।

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