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इस अमेरिकी कनेक्‍शन के कारण पीएम ने आपको कतार में खड़ा किया

JAN 11 , 2017
पीएम नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 8 नवंबर की रात देश में जब एक झटके से 500 और 1000 रुपये को चलन से बाहर करने का फरमान सुनाया था तो देश के बड़े तबके ने उन्हें काला धन के खिलाफ लड़ाई का चैंपियन माना था। मगर अब ऐसे सबूत सामने आने लगे हैं जो ये बताते हैं कि इसके पीछे दरअसल अमेरिका का कनेक्‍शन भी हो सकता है।

दरअसल पूरे देश को कतार में खड़ा कर देने वाले नोटबंदी के इस फैसले से करीब एक महीने पहले ही अमेरिकी संस्‍था यूएसएड ने भारत में नकदी रहित (कैशलेस) भुगतान को बढ़ावा देने के लिए ‘कैटेलिस्ट’ नाम से एक प्रोजेक्ट शुरू करने की घोषणा की थी। इस प्रोजक्ट को भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के लिए आरंभ करने की बात कही गई थी। इससे संबंधित प्रेस विज्ञप्ति यूएसएड की वेबसाइट पर 14 अक्टूबर को जारी की गई थी जिसमें इस प्रोजेक्ट की व्यापक जानकारी दी गई थी। मगर जब‌ सरकार ने 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा की तब आश्चर्यजनक रूप से इस विज्ञप्ति को वेबसाइट से हटा लिया गया। यानी नोटबंदी के अमेरिकी कनेक्‍शन के सबूत मिटाने की पूरी कोशिश की गई।

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हालांकि इंटरनेट पर यह विज्ञप्ति तलाश करने पर अब भी मिल जाती है। वैसे अमेरिकी कनेक्‍शन की बात यहीं खत्म नहीं होती। यूएसएड ने कैटेलिस्ट प्रोजेक्ट के लिए आलोक गुप्ता नामक शख्स को डायरेक्टर बनाया। आम लोगों को पता नहीं होगा मगर ये आलोक गुप्ता भारत में ‘आधार कार्ड’ परियोजना शुरू करने वाली बिलकुल शुरुआती टीम के सदस्य थे और ये कोई छिपी हुई बात नहीं है कि आधार परियोजना से अमेरिकी कंपनियों के हित जुड़े हुए थे। आलोक गुप्ता वाशिंगटन स्थित संस्‍था वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रहे हैं और इस संस्‍था की मुख्य दानदाता यूएसएड ही है। यह संस्‍था पूरी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए शोध करने का दावा करती है। एक और खास बात। नोटबंदी के दौरान ऑनलाइन शॉपिंग साइट स्नैपडील ने लोगों को दो-दो हजार रुपये घर पहुंचाने की योजना शुरू की। स्नैपडील और कैटेलिस्ट का लिंक भी सामने आया है। स्नैपडील के वाइस प्रेसिडेंट बादल मलिक कैटेलिस्ट प्रोजेक्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाए गए हैं। यानी प्रकारांतर से भारत का वित्त मंत्रालय, यूएसएड, अमेरिका का एक एनजीओ और एक देसी ऑनलाइन मार्केट साइट, ये सब नोटबंदी से एक महीने पहले ही एक-दूसरे के संपर्क में थे और भारत में नकदीरहित लेन-देन को बढ़ावा देने की तैयारियों में जुटे थे।

अब देखते हैं कि इस कैटेलिस्ट प्रोजेक्ट के साझेदार कौन हैं। यूएसएड ने नोटबंदी से करीब दस महीने पहले भारत में कैशलेस भुगतान पर एक व्यापक रिपोर्ट जारी की थी। यह रिपोर्ट इस अमेरिकी एजेंसी और यूएस ग्लोबल डेवलपमेंट लैब ने मिलकर तैयार की थी और रिपोर्ट का नाम ‘बियोंड कैश’ यानी ‘नकद से परे’ रखा गया था। कमाल की बात है कि यूएसएड की वेबसाइट पर अब आपको ये रिपोर्ट भी नहीं दिखेगी। इस रिपोर्ट की खास बात यह है कि इसमें नगदी रहित लेन-देन के आंकड़ों के इतर यह भी बताया गया है कि भारत में कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए भारतीय वित्त मंत्रालय के साथ देश-विदेश की 35 से अधिक संस्‍थाएं भागीदारी कर रही हैं। इन संस्‍थाओं में कौन शामिल हैं? इनमें शामिल हैं बड़े बैंक, नकद रहित भुगतान सेवा देने वाली कंपनियां, ई कॉमर्स कंपनियां और बड़ी आईटी कंपनियां जो इसके लिए सॉफ्टवेयर बनाती हैं आदि। यानी नगदी रहित लेन-देन से अंततः पूरा लाभ इन्हीं कंपनियों को मिलना था। इस रिपोर्ट में ही ये आंकड़े रखे गए कि भारत में सिर्फ 11 फीसदी लोग कार्ड से भुगतान करते हैँ और सिर्फ 6 फीसदी दुकानदार डिजिटल भुगतान स्वीकार करते हैं। इसी रिपोर्ट में यह बताया गया है कि देश में 95 करोड़ से ज्यादा लोगों के पास आधार कार्ड होने और 98 करोड़ लोगों के पास मोबाइल होने के कारण डिजिटल भुगतान को बड़े पैमाने पर सफल बनाया जा सकता है।

इन सब रिपोर्ट और प्रयासों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नोटबंदी का यह फैसला महज संयोग नहीं माना जा सकता। विशेषज्ञ पहले ही बता चुके हैं कि इस फैसले से बड़े पैमाने पर अमेरिकी कंपनियों को लाभ होने वाला है और देश का पैसा कमीशन के रूप में बाहर जाने वाला है।


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