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समाज मानते नहीं पर रचते हैं ‘इश्क की दुकान बन्द है’ के लेखक

FEB 17 , 2017
युवा लेखक नरेन्द्र सैनी की पहली पुस्तक ‘इश्क की दुकान बन्द है’ के लोकार्पण के बाद कहा कि इसमें हमारे समाज के मौजूदा यथार्थ को चित्रित किया गया है। संग्रह की कहानियों में पुरुष पात्र ज्यादा भावुक हैं। एक लेखक के रूप में मेरी कोशिश रही है कि कैरक्टर मुझे साथ लेकर चले, मैं कैरक्टर को साथ लेकर नहीं चलता हूँ।

       वाणी प्रकाशन की निदेशक अदिति माहेश्वरी गोयल, प्रबन्ध निदेशक अरुण माहेश्वरी और लेखक नरेन्द्र सैनी ने संयुक्त रूप से नई दिल्ली कनाट सर्कस स्थित ऑक्सफोर्ड बुक स्टोर के सभागार में ओम निश्चल समेत कई साहित्यकारों पत्रकारों की मौजूदगी में पुस्तक का लोकार्पण हुआ। सैनी लोकार्पण के बाद  पुस्तक परिचर्चा में अदिति माहेश्वरी गोयल के सवालों का जवाब दे रहे थे। अदिति ने जब पुस्तक के कंटेंट की ओर ध्यान दिलाया, तो  लेखक ने कहा कि शायद कंटेंट दमदार था इसलिए इसमें शामिल कहानियों को संपादकों ने प्रकाशित किया और आज यह किताब के रूप में हमारे सामने है। उन्होंने एक कहानी से अंश का पाठ करते हुए कहा कि हालांकि न हमारे पात्र समाज को मानते हैं और न ही मैं मानता हूँ। लेकिन इसके लिए इन्सपिरेशन समाज से ही लेता हूँ। ‘आयशा’ कहानी के जिक्र में सैनी ने कहा, यह कहानी बताती है कि अभी भी हम रूढ़िवादी सोच के दायरे से बाहर नहीं निकले हैं। आगे बढ़ रहे हैं लेकिन उतनी ही तेजी से पिछड़ भी रहे हैं। संग्रह में ऐसी बहुत-सी कहानियाँ हैं जिनमें पाठक क्लाइमेक्स से पहले ही टूट-फूट जाता है।

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   साहित्यकार ओम निश्चल ने कहा कि जात-पात की धारणा से भरा हुआ हमारा समाज सबसे ज्यादा वहीं पतन की ढलान पर उतरा है जहाँ हम कहते हैं कि हम आधुनिक हो गए हैं। वेलेंटाइन डे पर कितने गुलाब का वध होता है तब जाकर दिल में कोंपलें फूटती हैं। उन्होंने कहा कि हम दरअसल प्रेम के तथाकथित नकली यथार्थ को जीने वाले लोग हैं और यही सच इन कहानियों में उभर कर आया है। श्रोताओं के बीच से आए सवालों के जवाब में लेखक ने कहा कि प्रेम में जिसे हम उदात्त कहते हैं, आज उस इश्क़ की दुकान बन्द हो चुकी है।

वेलेंटाइन डे पर आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में बुक स्टोर की ओर से नीता श्रीधरन ने धन्यवाद ज्ञापन किया किया। मनोज मोहन, सत्येंद्र श्रीवास्तव आदि साहित्य प्रेमी मौजूद थे। 


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