Advertisement

विवेक मिश्र रमाकांत पुरस्कार से सम्मानित

विवेक मिश्र को साहित्यिक पत्रिका हंस में प्रकाशित उनकी कहानी ‘और गिलहरियां बैठ गईं’ के लिए अठारहवें रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
विवेक मिश्र रमाकांत पुरस्कार से सम्मानित

विवेक मिश्र को सम्मानित करते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी, विष्णुचंद्र शर्मा, संजीव और मत्रैयी पुष्पा ने उन्हें संभावनाशील रचनाकार बताया। दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार के अवसर पर विवेक मिश्र के रचनाकर्म पर रचना हुई और उनकी कहानियों पर लंबी चर्चा हुई।

रमाकांत ने कथानक रूढ़ियां नहीं बनाईं। वह जानते थे कि जैसे ही पाठक को यह पता चल जाता है कि आप जीवन नहीं, कहानी लिख रहे हैं तो वह आपसे कटने लगता है। यह कहते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी ने रमाकांत जी के व्यक्तित्व को श्रोताओं के सामने रखा। उन्होंने रमाकांत को सादतपुर का मार्खेज बताया। कवि-कथाकार विष्णुचंद्र शर्मा ने कहा कि वह एक विस्थापित लेखक थे।  

वरिष्ठ  कथाकार  मैत्रेयी पुष्पा ने ‘और गिलहरियां बैठ गईं’ के संदर्भ में कहा कि कहानी को कई बार पढ़ना चाहिए। मेरे लिए इस कहानी में बहुत कुछ अपना सा था। उसमें स्त्रियों का मौन कितना मुखर है। ‘हंस’ के संपादक संजय सहाय का कहना था कि विवेक की भाषा और स्वत: संपादन का तरीका बहुत अच्छा है।

पुरस्कार के लिए इस कहानी का चयन करने वाले रंगकर्मी दिनेश खन्ना का कहना था कि यह कहानी वातावरण में ले जाकर छोड़ देती है। पाठक को लौटने का रास्ता खोजना पड़ता है। कलात्मकता लिए यह कहानी जीवन के अध्याय खोलती है। इस कहानी में एक ऐसा रहस्य है जिसके उत्तर नहीं मिलते। यहां गिलहरियां तक घबराईं हुई थीं। इस कहानी की सूक्ष्मता प्रभावित करती है। आलोचक सुशील सिद्धार्थ का कहना था कि लघुता में प्रभुता खोज लेने वाला लेखक बड़ा होता है।

वरिष्ठ कथाकार संजीव ने विवेक मिश्र को रमाकांत जी की स्मृति में दिए जाने वाले पुरस्कार से सम्मानित होने पर बधाई दी और कहा-जादुई यथार्थवाद के मुहावरे को पकड़ने के लिए विवेक को कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ी। यह कहानी सौंदर्य के नए प्रतिमान गढ़ती है। गिलहरियां यहां जादू के वश में उठ खड़ी हुईं और उसके खत्म होते ही बैठ गईं।

पुरस्कृत विवेक मिश्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि इस कहानी को पढ़ाजाना मेरे दर्द को पहचान लिया जाना भी है। यह शायद वह कहानी है जो मैं कभी लिखना नहीं चाहता था और जानता था कि इसे लिखे बगैर मैं रह नहीं पाऊंगा। मेरा बनना बिगड़ना ही इस कहानी का बनना बिगड़ना है। मैं इसे आगे भी बनाए रखूंगा। संयोजक महेश दर्पण ने बताया कि आगामी वर्ष निर्णायक होंगे, वरिष्ठ रंगकर्मी देवेंद्र राज अंकुर। निर्णायक मंडल के नए दो और सदस्य होंगे कहानीकार महेश कटारे और फिल्मकार अनवर जमाल। 

अब आप हिंदी आउटलुक अपने मोबाइल पर भी पढ़ सकते हैं। डाउनलोड करें आउटलुक हिंदी एप गूगल प्ले स्टोर या एपल स्टोर से
Advertisement
Advertisement
Advertisement
  Close Ad